Karṇa’s advance against the Pāṇḍava host; Arjuna’s clash with the Saṃśaptakas (कर्णस्य पाण्डवसेनाप्रवेशः—अर्जुनस्य संशप्तकसंप्रहारः)
तेषां पितामह: प्रीतो वरद: प्रददौ बरम्,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे
teṣāṃ pitāmahaḥ prīto varadaḥ pradadau varam | nibodha manasā cātra na te kāryā vicāraṇā ||
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ସେମାନଙ୍କ ପିତାମହ (ବ୍ରହ୍ମା) ପ୍ରସନ୍ନ ହୋଇ, ବରଦାତା ରୂପେ, ସେମାନଙ୍କୁ ବର ପ୍ରଦାନ କଲେ। ସ୍ଥିରମନେ ଶୁଣ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ କିମ୍ବା ଦ୍ୱିତୀୟ ଅନୁମାନ ରଖନି।
दुर्योधन उवाच