तेन चैवातिकोपेन स यज्ञ: संधितस्तदा । भग्नाश्नापि सुरा आसन् भीताश्चाद्यापि त॑ं प्रति,राजन्! सब देवता भयभीत हो भगवान् शंकरकी शरणमें आये। तब क्रोध शान्त होनेपर उन्होंने उस यज्ञको पूर्ण किया। उन दिनों देवता लोग भाग खड़े हुए थे, तभीसे आजतक वे देवता उनसे डरते रहते हैं
ସେହି ଅତ୍ୟଧିକ କ୍ରୋଧ ଦ୍ୱାରା ତେବେ ସେ ଯଜ୍ଞଟି ସଂଗଠିତ ହୋଇ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ହେଲା। ଦେବମାନେ ସେତେବେଳେ ମଧ୍ୟ ଭୟରେ ଛତ୍ରଭଙ୍ଗ ହୋଇଥିଲେ, ଏବଂ ଆଜି ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କ ପ୍ରତି ଭୟ ରଖନ୍ତି।
व्यास उवाच