Vāsudeva-Māhātmya: Duryodhana’s Inquiry and Bhīṣma’s Theological Account of Keśava
/ [दाक्षिणात्य अधिक पाठका हई “लोक मिलाकर कुछ ४६ ३ “लोक हैं] नसजआा न (0) आज अन+- एकोनषशष्टितमो< ध्याय: भीष्मका पराक्रम, श्रीकृष्णका भीष्मको मारनेके लिये उद्यत होना, अर्जुनकी प्रतिज्ञा और उनके द्वारा कौरव- सेनाकी पराजय, तृतीय दिवसके युद्धकी समाप्ति ध्ृतराष्र उवाच प्रतिज्ञाते ततस्तस्मिन् युद्धे भीष्मेण दारुणे । क्रोधितो मम पुत्रेण दु:खितेन विशेषत:,धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! उस भयंकर युद्धमें जब भीष्मने मेरे विशेष दुःखी हुए पुत्रके क्रोध दिलानेपर प्रतिज्ञा कर ली, तब उन्होंने उस युद्धस्थलमें पाण्डवोंके प्रति क्या किया? तथा पांचाल योद्धाओंने पितामह भीष्मके प्रति क्या किया? इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें तीसरे दिन येनाके विश्रामके लिये लौटनेसे सम्बन्ध रखनेवाला उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ५९ ॥ [दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६ “लोक मिलाकर कुल १४० ६ “लोक हैं।] भी्न्म+ज (2) अमसना - सेई जन्तु, जिसके बदनमें काँटे होते हैं । षष्टितमो< ध्याय: चौथे दिन--दोनों सेनाओंका व्यूह-निर्माण तथा भीष्म और अर्जुनका द्वैरथ-युद्ध संजय उवाच व्युष्टां निशां भारत भारताना- मनीकिनीनां प्रमुखे महात्मा । ययौ सपत्नान् प्रति जातकोपो वृतः समग्रेण बलेन भीष्म:
dhṛtarāṣṭra uvāca |
pratijñāte tataḥ tasmin yuddhe bhīṣmeṇa dāruṇe |
krodhito mama putreṇa duḥkhitena viśeṣataḥ ||
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ସଞ୍ଜୟ! ସେହି ଭୟଙ୍କର ଯୁଦ୍ଧରେ, ମୋର ବିଶେଷ ଦୁଃଖିତ ପୁଅର କ୍ରୋଧରେ ଉଦ୍ଦୀପ୍ତ ହୋଇ ଭୀଷ୍ମ ଯେତେବେଳେ ପ୍ରତିଜ୍ଞା କଲେ, ତା’ପରେ ରଣଭୂମିରେ ସେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପ୍ରତି କ’ଣ କଲେ? ମୋତେ କହ।
ध्ृतराष्र उवाच
The verse highlights how grief and attachment can fuel anger and escalate violence: Dhṛtarāṣṭra frames events through his son’s distress, showing the ethical danger of partiality and emotional agitation in decisions of war.
Dhṛtarāṣṭra questions Sañjaya about a turning point: Bhīṣma, provoked by Dhṛtarāṣṭra’s son (Duryodhana) and in a dreadful battle, has taken a vow; the king asks what Bhīṣma then did against the Pāṇḍavas.