भीष्मविक्रमदर्शनं तथा क्रौञ्चारुणव्यूहविधानम् | Bhīṣma’s Ascendancy and the Organization of the Krauñcāruṇa Formation
सम्बन्ध-- अर्जुनकी जिज्ञासाके अनुसार त्यागका यानी कर्मयोगका और संन्यासका यानी सांख्ययोगका तत्व अलय-अलय समझाकर यहाँतक उस प्रकरणको समाप्त कर दिया; किंतु इस वर्णनमें भगवान्ने यह बात नहीं कही कि दोनोंगेंसे तुम्हारे लिये अमुक साधन कर्तव्य है; अतएव अर्जुनको भक्तिप्रधान कर्मयोग ग्रहण करानेके उद्देश्यसे अब भक्तिप्रधान कर्मयोगकी महिमा कहते हैं-- सर्वकर्माण्यपिः सदा कुर्वाणो मद्बयपाश्रय: । मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्व॒तं पदमव्ययम्,मेरे परायण हुआः कर्मयोगी तो सम्पूर्ण कर्मोको सदा करता हुआ भी मेरी कृपासे सनातन अविनाशी परमपदको3 प्राप्त हो जाता हैडं
sarvakarmāṇy api sadā kurvāṇo madvyapāśrayaḥ | matprasādād avāpnoti śāśvataṁ padam avyayam ||
ମୋର ଆଶ୍ରୟ ନେଇଥିବା କର୍ମଯୋଗୀ ସଦା ସମସ୍ତ କର୍ମ କରୁଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ମୋର କୃପାରେ ଶାଶ୍ୱତ ଅବ୍ୟୟ ପରମପଦ ପାଏ।
अजुन उवाच