भीष्मविक्रमदर्शनं तथा क्रौञ्चारुणव्यूहविधानम् | Bhīṣma’s Ascendancy and the Organization of the Krauñcāruṇa Formation
सम्बन्ध-- पूर्वश्लोकर्में यह बात कही गयी कि मनुष्य अपने स्वाभाविक कमाद्वारा परमेश्वरकी पूजा करके परम सिद्धिको पा लेता है; इसपर यह शंका होती है कि यदि कोई क्षत्रिय अपने युद्धादि क्रूर कर्मोको न करके; ब्राह्मणोंकी भाँति अध्यापनादि शान्तिमय कर्मोसे अपना निर्वाह करके परमात्माको प्राप्त करनेकी चेष्टा करे या इसी तरह कोई वैश्य या शूद्र अपने कर्मोको उच्च वर्णोके कर्मोंसे हीन समझकर उनका त्याग कर दे और अपनेसे ऊँचे वर्णकी वृत्तिसे अपना निर्वाह करके परमात्माको प्राप्त करनेका प्रयत्न करे तो उचित है या नहीं। इसपर दूसरेके धर्मकी अपेक्षा स्वधर्मकों श्रेष्ठ बतलाकर उसके त्यागका निषेध करते हैं-- श्रेयान् स्वधर्मोर्ट विगुण: परधर्मात् स्वनुछितात् । स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्रोति किल्बिषम्,अच्छी प्रकार आचरण किये हुए दूसरेके धर्मसे5 गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है;> क्योंकि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको नहीं प्राप्त होताः
arjuna uvāca — śreyān svadharmo viguṇaḥ paradharmāt svanuṣṭhitāt | svabhāvaniyataṁ karma kurvann āpnoti kilbiṣam ||
ଅନ୍ୟର ଧର୍ମକୁ ଭଲଭାବେ ଆଚରଣ କରିବାଠାରୁ, ଗୁଣହୀନ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ନିଜ ଧର୍ମ ଶ୍ରେଷ୍ଠ; କାରଣ ସ୍ୱଭାବଦ୍ୱାରା ନିୟତ କର୍ମ କରୁଥିବା ମନୁଷ୍ୟ ପାପକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ ନାହିଁ।
अजुन उवाच