Adhyāya 41 — Yudhiṣṭhira’s Gurv-anumati and Strategic Counsel (युधिष्ठिरस्य गुर्वनुमतिः)
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासड्रसमुद्धवम् । तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसड्रेन देहिनम्,हे अर्जुन! रागरूप रजोगुणको कामना और आसक्तिसे उत्पन्न जान*। वह इस जीवात्माको कर्मोके और उनके फलके सम्बन्धसे बाँधता है:
rajo rāgātmakaṁ viddhi tṛṣṇā-saṅga-samudbhavam | tan nibadhnāti kaunteya karma-saṅgena dehinam ||
ହେ ଅର୍ଜୁନ! ରଜୋଗୁଣକୁ ରାଗସ୍ୱରୂପ ବୋଲି ଜାଣ; ଏହା ତୃଷ୍ଣା ଓ ଆସକ୍ତିରୁ ଉତ୍ପନ୍ନ। ହେ କୌନ୍ତେୟ! ଏହା ଦେହୀକୁ କର୍ମର ସଙ୍ଗରେ (ଏବଂ କର୍ମଫଳଲୋଭରେ) ବାନ୍ଧେ।
अजुन उवाच