विभूति-योगः (Vibhūti-yoga) — Exemplary Manifestations as a Contemplative Index
सम्बन्ध-- आठवें और दसवें शलोकोंमें अधियज्ञकी उपासनाका फल परम दिव्य पुरुषकी प्राप्ति; तेरहवें *लोकमें परम अक्षर निर्गुण ब्रह्ममीे उपासनाका फल परमगतिकी प्राप्ति और चौदहवें शलोकमें सगुण-साकार भगवान् श्रीकृष्णणी उपासनाका फल भगवान्की प्राप्ति बतलाया गया है। इससे तीनोंगें किसी प्रकारके भेदका भ्रम न हो जाय; इस उद्देश्यसे अब सबकी एकताका प्रतिपादन करते हुए उनकी प्राप्तिके बाद पुनर्जन्मका अभाव दिखलाते हैं-- अव्यक्तोक्षर इत्युक्तस्तमाहु: परमां गतिम् । य॑ं प्राप्प न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम,सम्बन्ध-- अर्जुनके सातवें प्रश्नका उत्तर देते हुए भगवान्ने अन्तकालमें किस प्रकार मनुष्य परमात्माको प्राप्त होता है; यह बात भलीभाँति समझायी। प्रसंगवश यह बात भी कही कि भगवत्प्राप्ति न होनेपर ब्रह्मलोकतक पहुँचकर भी जीव आवागमनके चक््करसे नहीं छूटता: परंतु वहाँ यह बात नहीं कही गयी कि जो वापस न लौटनेवाले स्थानको प्राप्त होते हैं; वे किस रास्तेसे और कैसे जाते हैं तथा इसी प्रकार जो वापस लौटनेवाले स्थानोंकी प्राप्त होते हैं. वे किस रास्तेसे जाते हैं। अत: उन दोनों मार्गोका वर्णन करनेके लिये भगवान् प्रस्तावना करते हैं-- यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्ति चैव योगिन: । प्रयाता यान्ति तं काल॑ वक्ष्यामि भरतर्षभ हे अर्जुन! जिस कालमें* शरीर त्यागकर गये हुए योगीजनः तो वापस न लौटनेवाली गतिको और जिस कालमें गये हुए वापस लौटनेवाली गतिको ही प्राप्त होते हैं, उस कालको अर्थात् दोनों मार्गोंको कहूँगा
ଅବ୍ୟକ୍ତ ଓ ଅକ୍ଷର—ଯାହାକୁ ପରମ ଗତି କୁହାଯାଏ—ସେହି ମୋର ପରମ ଧାମ; ତାହାକୁ ପ୍ରାପ୍ତ କଲେ ପୁଣି ଫେରିବା ନାହିଁ। ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଯେ କାଳରେ ଦେହ ତ୍ୟାଗ କରି ଯାଇଥିବା ଯୋଗୀମାନେ ଅନାବୃତ୍ତି (ଅଫେରା) ଗତିକୁ, ଏବଂ ଯେ କାଳରେ ଯାଇଥିବାମାନେ ଆବୃତ୍ତି (ଫେରା) ଗତିକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଅନ୍ତି—ସେହି କାଳ, ଅର୍ଥାତ୍ ଉଭୟ ମାର୍ଗ, ମୁଁ ଏବେ କହିବି।
अजुन उवाच