कर्मयोग–ज्ञानयज्ञ–अवतारोपदेश
Karma-Yoga, Jñāna-Yajña, and Avatāra Instruction
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमाप: प्रविशन्ति यद्धत् तद्वत् कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्रोति न कामकामी,जैसे नाना नदियोंके जल सब ओरसे परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठावाले समुद्रमें उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुषमें किसी प्रकारका विकार उत्पन्न किये बिना ही समा जाते हैं,5 वही पुरुष परम शान्तिको प्राप्त होता है, भोगोंको चाहनेवाला नहीं
āpūryamāṇam acala-pratiṣṭhaṁ samudram āpaḥ praviśanti yadvat | tadvat kāmā yaṁ praviśanti sarve sa śāntim āpnoti na kāma-kāmī ||
ଯେପରି ଅନେକ ନଦୀର ଜଳ ସଦା ପୂର୍ଣ୍ଣ ହେଉଥିବା ଅଚଳ-ପ୍ରତିଷ୍ଠ ସମୁଦ୍ରରେ ପ୍ରବେଶ କରି ତାହାକୁ ବିଚଳିତ କରେନାହିଁ, ସେପରି ସମସ୍ତ କାମନା ଯାହାରେ ପ୍ରବେଶ କରିଲେ ମଧ୍ୟ ବିକାର ଜନ୍ମାଏ ନାହିଁ—ସେଇ ପୁରୁଷ ଶାନ୍ତି ପାଏ; ଭୋଗକାମୀ ନୁହେଁ।
अजुन उवाच