तेन सत्त्ववता संख्ये शूरेणाहवशोभिना । कृतिना समरे राजन् संधिर्भवतु मा चिरम्,“तात! पाण्डुपुत्र अर्जुनको युद्धमें किसी प्रकार भी जीतना असम्भव है। जिन महामनस्वी पुरुषके ये अलौकिक कर्म प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं; जो धैर्यवान्, युद्धमें शूरता दिखानेवाले तथा संग्राममें सुशोभित होनेवाले हैं, राजन्! उन अस्त्र-विद्याके विद्वान् अर्जुनके साथ इस समरभूमिमें तुम्हारी शीघ्र संधि हो जानी चाहिये। इसमें विलम्ब न हो
tena sattvavatā saṅkhye śūreṇāhavaśobhinā | kṛtinā samare rājan sandhir bhavatu mā ciram ||
ରାଜନ୍! ସେହି ଧୈର୍ୟବାନ, ଶୂର, ଯୁଦ୍ଧରେ ଶୋଭିତ ଓ ସମରେ କୃତକୃତ୍ୟ ପୁରୁଷଙ୍କ ସହ ଶୀଘ୍ର ସନ୍ଧି ହେଉ; ବିଳମ୍ବ କରନ୍ତୁ ନାହିଁ।
संजय उवाच