तत्र रत्नानि दिव्यानि स्वयं रक्षति केशव: । प्रसन्नश्चाभवत् तत्र प्रजानां व्यद्धत् सुखम्,स्वयं भगवान् केशव ही वहाँ दिव्य रत्नोंको रखते और उनकी रक्षा करते हैं। वे वहाँकी प्रजापर प्रसन्न हुए थे, इसलिये उनको सुख पहुँचानेकी व्यवस्था उन्होंने स्वयं की है
ସେଠାରେ ଭଗବାନ କେଶବ ସ୍ୱୟଂ ଦିବ୍ୟ ରତ୍ନଗୁଡ଼ିକୁ ରଖି ତାହାଙ୍କର ରକ୍ଷା କରନ୍ତି। ସେଠାର ପ୍ରଜାଙ୍କ ପ୍ରତି ପ୍ରସନ୍ନ ହୋଇ, ତାଙ୍କ ସୁଖର ବ୍ୟବସ୍ଥା ସେ ନିଜେ କରିଥିଲେ।
संजय उवाच