Bhīṣma–Karṇa Saṃvāda on the Śaraśayyā (भीष्म–कर्ण संवादः शरशय्यायाम्)
चित्रसेनादयश्वैव पुत्रास्तव विशाम्पते । पज्चभि: पज्चभिस्तूर्ण संयुगे निशितै: शरै:,एकैकं त्रिभिरानर्च्छत् कड़ुकबर्हिणवाजितै: । उसके बाद सुशर्मा और कृपाचार्यको भी तीन-तीन बाणोंसे बींध डाला। राजेन्द्र! फिर समरांगणमें प्राग्ज्योतिषनरेश भगदत्त, सिन्धुराज जयद्रथ, चित्रसेन, विकर्ण, कृतवर्मा, दुर्मीषण तथा महारथी विन्द और अनुविन्द--इनमैंसे प्रत्येकको गीधकी पाँखसे युक्त तीन- तीन बाणोंद्वारा विशेष पीड़ा दी
sañjaya uvāca |
citrasenādayaś caiva putrās tava viśāmpate |
pañcabhiḥ pañcabhis tūrṇaṃ saṃyuge niśitaiḥ śaraiḥ |
ekaikaṃ tribhir ānarccchat kaṅkabārhiṇavājitaiḥ |
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ବିଶାମ୍ପତେ! ଚିତ୍ରସେନ ଆଦି ତୁମ ପୁତ୍ରମାନେ ଯୁଦ୍ଧରେ ଶୀଘ୍ର ପାଞ୍ଚ-ପାଞ୍ଚ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଶରରେ ଆହତ ହେଲେ; ପରେ ଗିଧ ପାଖ ଲଗା ଶରଦ୍ୱାରା ପ୍ରତ୍ୟେକଙ୍କୁ ତିନି-ତିନି ଶରରେ ଆଉଥରେ ବିଦ୍ଧ କରାଗଲା।
संजय उवाच