Babhruvāhana’s Lament and Appeal for Expiation (प्रायश्चित्त-याचना)
उलूपि पश्य भर्तारें शयानं निहतं रणे । त्वत्कृते मम पुत्रेण बाणेन समितिंजयम्,“उलूपी! देखो, हम दोनोंके स्वामी मारे जाकर रणभूमिमें सो रहे हैं। तुम्हारी प्रेरणासे ही मेरे बेटेने समरविजयी अर्जुनका वध किया है
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ଉଲୂପୀ! ଦେଖ—ଆମ ଭର୍ତ୍ତା ରଣଭୂମିରେ ନିହତ ହୋଇ ଏଠାରେ ଶୋଇଛନ୍ତି। ତୋର କାରଣରୁ ମୋ ପୁତ୍ର ନିଜ ବାଣରେ ସମିତିଞ୍ଜୟ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ବଧ କରିଛି।
वैशम्पायन उवाच