
प्राग्ज्योतिषे वज्रदत्त-धनंजय-समागमः (Vajradatta Confronts Dhanaṃjaya at Prāgjyotiṣa)
Upa-parva: Aśvamedha-anugamana (Horse-Tracking Campaign Episodes)
Vaiśaṃpāyana reports that the consecrated horse enters Prāgjyotiṣa territory, prompting Vajradatta—Bhagadatta’s son and a battle-hardened ruler—to emerge and contest the intrusion (1–3). Arjuna (Dhanaṃjaya), recognizing the challenge, advances rapidly with Gāṇḍīva prepared, treating the encounter as a regulated engagement tied to the horse’s protection (4). Vajradatta is temporarily disoriented by Arjuna’s arrow-work, releases the horse, and charges Arjuna directly (5). He then re-enters the city to re-arm and returns mounted on a foremost elephant, accompanied by royal insignia (parasol and white fly-whisk), and issues a challenge shaped by youthful pride and confusion in combat (6–8). Vajradatta drives the massive elephant toward Arjuna’s white horse; the elephant is described as disciplined for warfare and violently energetic (9–11). Arjuna fights the elephant-mounted adversary from the ground, meeting the charge with controlled archery (12). Vajradatta hurls blazing tomara-spears; Arjuna intercepts and fragments them mid-air with Gāṇḍīva arrows (13–14). Vajradatta counters with arrow volleys; Arjuna replies with faster, gold-feathered shafts, wounding Vajradatta, who falls but retains composure (15–17). Remounting, Vajradatta renews the contest; Arjuna sends serpent-like arrows, severely wounding the elephant, which bleeds profusely and is likened to a mountain with many streams (18–20). The chapter emphasizes ritualized sovereignty-testing through calibrated martial display rather than annihilative warfare.
Chapter Arc: यज्ञ का पवित्र अश्व पाण्डव-सीमा पर आता है, और सीमा-रक्षक वीर उसे घेरकर पकड़ने को उद्यत हो उठते हैं—यज्ञ की शान्ति के भीतर युद्ध का बीज फूट पड़ता है। → त्रिगर्त-वीर रथों पर, बद्ध-तूणीरा और सुसज्जित अश्वों सहित, यज्ञाश्व को घेरते हैं। किरीटी अर्जुन उनके अभिप्राय को भाँपकर पहले सान्त्व-नीति से रोकना चाहता है, परन्तु प्रतिरोध बढ़ता जाता है और वाणी का पुल टूटने लगता है। → सूर्यवर्मा अर्जुन पर तीव्र, लघु-अस्त्र-प्रदर्शन सहित शर-वर्षा करता है; अर्जुन रक्त पोंछकर दिव्य धनुष उठाता है और विष-सदृश तीक्ष्ण बाणों से प्रतिघात कर त्रिगर्तों की पंक्तियाँ तोड़ देता है—यज्ञाश्व की रक्षा हेतु उसका क्रोध निर्णायक बन जाता है। → त्रिगर्त-सेना भगदड़ में टूटती है। पराजित राजागण विनीत होकर आज्ञा माँगते हैं; अर्जुन उन्हें जीवन-रक्षा का उपदेश देता है—‘प्राण बचाओ, शासन स्वीकार करो’—और यज्ञाश्व का मार्ग सुरक्षित कर देता है। → पराजितों का समर्पण तो हो गया, पर अश्व की आगे की यात्रा में कौन-सा नया राज्य चुनौती देगा—यह अनकहा रह जाता है।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वरमें अ्जुनिके द्वारा अश्वका अनुसरणविषयक तिह्तत्तववाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ७३ ॥। अपने-आप बछ। आर: 2 चतु:सप्ततितमो< ध्याय: अर्जुनके द्वारा त्रिगर्तोंकी पराजय वैशम्पायन उवाच त्रिगर्तैरभवद् युद्ध कुतवैरै: किरीटिन: । महारथसमज्ञातैहतानां पुत्रनप्तृभि:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! कुरुक्षेत्रके युद्धमें जो त्रिगर्त वीर मारे गये थे, उनके महारथी पुत्रों और पौत्रोंने किरीटधारी अर्जुनके साथ वैर बाँध लिया था। त्रिगर्तदेशमें जानेपर अर्जुनका उन त्रिगर्तोंक साथ घोर युद्ध हुआ था
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ରାଜନ! କୁରୁକ୍ଷେତ୍ର ଯୁଦ୍ଧରେ ଯେ ତ୍ରିଗର୍ତ୍ତ ବୀରମାନେ ନିହତ ହୋଇଥିଲେ, ସେମାନଙ୍କ ମହାରଥୀ ପୁତ୍ର ଓ ପୌତ୍ରମାନେ କିରୀଟଧାରୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ସହ ବୈର ବାନ୍ଧିଲେ। ଅର୍ଜୁନ ତ୍ରିଗର୍ତ୍ତଦେଶକୁ ପହଞ୍ଚିବା ସହିତ ସେମାନଙ୍କ ସହ ଘୋର ଯୁଦ୍ଧ ହେଲା।
Verse 2
ते समाज्ञाय सम्प्राप्तं यज्ञियं तुरगोत्तमम् । विषयान्तं ततो वीरा दंशिता: पर्यवारयन्,'पाण्डवोंका यज्ञसम्बन्धी उत्तम अश्व हमारे राज्यकी सीमामें आ पहुँचा है” यह जानकर त्रिगर्तीीर कवच आदिसे सुसज्जित हो पीठपर तरकस बाँधे सजे-सजाये अच्छे घोड़ोंसे जुते हुए रथपर बैठकर निकले और उस अश्वको उन्होंने चारों ओरसे घेर लिया। राजन! घोड़ेको घेरकर वे उसे पकड़नेका उद्योग करने लगे
“ଯଜ୍ଞସମ୍ବନ୍ଧୀ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଅଶ୍ୱ ଆମ ରାଜ୍ୟସୀମାକୁ ପହଞ୍ଚିଛି”—ଏହା ଜାଣି ସେହି ବୀରମାନେ ସଜ୍ଜିତ ହୋଇ ତାହାକୁ ଚାରିଦିଗରୁ ଘେରିଲେ ଏବଂ ଧରିବାକୁ ଉଦ୍ୟମ କଲେ।
Verse 3
रथिनो बद्धतूणीरा: सदश्वैः समलंकृतै: । परिवार्य हयं राजन ग्रहीतुं सम्प्रचक्रमु:,'पाण्डवोंका यज्ञसम्बन्धी उत्तम अश्व हमारे राज्यकी सीमामें आ पहुँचा है” यह जानकर त्रिगर्तीीर कवच आदिसे सुसज्जित हो पीठपर तरकस बाँधे सजे-सजाये अच्छे घोड़ोंसे जुते हुए रथपर बैठकर निकले और उस अश्वको उन्होंने चारों ओरसे घेर लिया। राजन! घोड़ेको घेरकर वे उसे पकड़नेका उद्योग करने लगे
ରାଜନ! ରଥୀ ଯୋଦ୍ଧାମାନେ ପିଠିରେ ତୂଣୀର ବାନ୍ଧି, ଉତ୍ତମ ଘୋଡ଼ା ଯୁକ୍ତ ସୁସଜ୍ଜିତ ରଥରେ ଚଢ଼ି, ସେହି ଅଶ୍ୱକୁ ଚାରିଦିଗରୁ ଘେରି ଧରିବାକୁ ଉଦ୍ୟମ କଲେ।
Verse 4
ततः किरीटी संचिन्त्य तेषां तत्र चिकीर्षितम् । वारयामास तान् वीरान् सान्त्वपूर्वमरिंदम:,शत्रुओंका दमन करनेवाले अर्जुन यह जान गये कि वे क्या करना चाहते हैं। उनके मनोभावका विचार करके वे उन्हें शान्तिपूर्वक समझाते हुए युद्धसे रोकने लगे
ତେବେ କିରୀଟୀ ଅର୍ଜୁନ ସେଠାରେ ସେହି ବୀରମାନେ କ’ଣ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛନ୍ତି ତାହା ଚିନ୍ତା କଲେ। ତାଙ୍କର ଅନ୍ତର୍ଭାବ ଜାଣି ଶତ୍ରୁଦମନ ଅର୍ଜୁନ ପ୍ରଥମେ ସାନ୍ତ୍ୱନାମୟ ମୃଦୁବାକ୍ୟରେ ସମାଧାନ କରି ଯୁଦ୍ଧରୁ ତାଙ୍କୁ ରୋକିବାକୁ ଲାଗିଲେ।
Verse 5
तदनादृत्य ते सर्वे शरैरभ्यहनंस्तदा । तमोरजोभ्यां संछन्नांस्तान् किरीटी न्यवारयत्,किंतु वे सब उनकी बातकी अवहेलना करके उन्हें बाणोंद्वारा चोट पहुँचाने लगे। तमोगुण और रजोगुणके वशीभूत हुए उन त्रिगर्तोंको किरीटीने युद्धसे रोकनेकी पूरी चेष्टा की
କିନ୍ତୁ ସେମାନେ ତାଙ୍କ କଥା ଅଗ୍ରାହ୍ୟ କରି ସେତେବେଳେ ବାଣବର୍ଷାରେ ଆଘାତ କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ। ତମସ୍ ଓ ରଜସ୍ରେ ଆବୃତ ସେହି ତ୍ରିଗର୍ତ୍ତମାନଙ୍କୁ କିରୀଟୀ ଯୁଦ୍ଧରୁ ରୋକିବାକୁ ସର୍ବତ୍ର ପ୍ରୟାସ କଲେ।
Verse 6
तानब्रवीत् ततो जिष्णु: प्रहसन्निव भारत । निवर्तध्वमधर्मज्ञा: श्रेयो जीवितमेव च,भारत! तदनन्तर विजयशील अर्जुन हँसते हुए-से बोले--'धर्मको न जाननेवाले पापात्माओ! लौट जाओ। जीवनकी रक्षामें ही तुम्हारा कल्याण है”
ତାପରେ ଜିଷ୍ଣୁ ଅର୍ଜୁନ ହସିବା ପରି କହିଲେ—“ହେ ଭାରତ! ଧର୍ମ ନ ଜାଣୁଥିବା ପାପାତ୍ମମାନେ, ଫେରିଯାଅ; ଜୀବନ ରକ୍ଷାରେ ହିଁ ତୁମର ଶ୍ରେୟ ଅଛି।”
Verse 7
स हि वीर: प्रयास्यन् वै धर्मराजेन वारितः । हतबान्धवा न ते पार्थ हन्तव्या: पार्थिवा इति,वीर अर्जुनने ऐसा इसलिये कहा कि चलते समय धर्मराज युधिष्ठिरने यह कहकर मना कर दिया था कि “कुन्तीनन्दन! जिन राजाओंके भाई-बन्धु कुरुक्षेत्रके युद्धमें मारे गये हैं, उनका तुम्हें वध नहीं करना चाहिये”
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେହି ବୀର ଅର୍ଜୁନ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରିବାକୁ ଯାଉଥିବାବେଳେ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ତାଙ୍କୁ ରୋକି କହିଲେ—“ହେ ପାର୍ଥ! କୁରୁକ୍ଷେତ୍ର ଯୁଦ୍ଧରେ ଯାହାଙ୍କର ବନ୍ଧୁ-ବାନ୍ଧବ ନିହତ ହୋଇଛନ୍ତି, ସେହି ରାଜାମାନଙ୍କୁ ତୁମେ ବଧ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ।”
Verse 8
स तदा तद् वच: श्रुत्वा धर्मराजस्य धीमतः । तान् निवर्तध्वमित्याह न न्यवर्तन्त चापि ते,बुद्धिमान् धर्मरमाजके इस आदेशको सुनकर उसका पालन करते हुए ही अर्जुनने त्रिगर्तोंकी लौट जानेकी आज्ञा दी तथापि वे नहीं लौटे
ସେତେବେଳେ ବୁଦ୍ଧିମାନ ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି, ତାହା ପାଳନ କରି ଅର୍ଜୁନ ସେମାନଙ୍କୁ କହିଲେ—“ଫେରିଯାଅ।” କିନ୍ତୁ ସେମାନେ ଫେରିଲେ ନାହିଁ।
Verse 9
ततल्त्रिगर्तराजानं सूर्यवर्माणमाहवे । विचित्य शरजालेन प्रजहास धनंजय:,तब उस युद्धस्थलमें त्रिगर्तराज सूर्यव्माके सारे अंगोंमें बाण धँसाकर अर्जुन हँसने लगे
ତେବେ ରଣଭୂମିରେ ଧନଞ୍ଜୟ ଅର୍ଜୁନ ତ୍ରିଗର୍ତ୍ତରାଜ ସୂର୍ୟବର୍ମାଙ୍କୁ ବିଶେଷ କରି ଲକ୍ଷ୍ୟ କରି ବାଣଜାଳରେ ଢାକିଦେଲେ ଏବଂ ହସିଉଠିଲେ।
Verse 10
ततस्ते रथघोषेण रथनेमिस्वनेन च । पूरयन्तो दिश: सर्वा धनंजयमुपाद्रवन्,यह देख त्रिगर्तदेशीय वीर रथकी घरघराहट और पहियोंकी आवाजसे सारी दिशाओंको गुँजाते हुए वहाँ अर्जुनपर टूट पड़े
ତାପରେ ସେମାନେ ରଥଘୋଷ ଓ ଚକ୍ରଧ୍ୱନିରେ ସମସ୍ତ ଦିଗକୁ ପୂରି ଧନଞ୍ଜୟ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ଉପରେ ଧାଇଆସିଲେ।
Verse 11
सूर्यवर्मा ततः पार्थे शराणां नतपर्वणाम् | शतान्यमुज्चद् राजेन्द्र लघ्वस्त्रमभिदर्शयन्,राजेन्द्र! तदनन्तर सूर्यवर्माने अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए अर्जुनपर झुकी हुई गाँठवाले एक सौ बाणोंका प्रहार किया
ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ତାପରେ ସୂର୍ୟବର୍ମା ନିଜ ଲଘ୍ୱସ୍ତ୍ର-ଦକ୍ଷତା ପ୍ରଦର୍ଶନ କରି ପାର୍ଥ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ଉପରେ ନତପର୍ବଣ ଶତ ବାଣ ଛାଡ଼ିଲେ।
Verse 12
तथैवान्ये महेष्वासा ये च तस्यानुयायिन: । मुमुचु: शरवर्षाणि धनंजयवधैषिण:,इसी प्रकार उसके अनुयायी वीरोंमें भी जो दूसरे-दूसरे महान् धनुर्धर थे, वे भी अर्जुनको मार डालनेकी इच्छासे उनपर बाणोंकी वर्षा करने लगे
ସେହିପରି ତାଙ୍କ ଅନୁୟାୟୀ ଅନ୍ୟ ମହାଧନୁର୍ଧରମାନେ ମଧ୍ୟ ଧନଞ୍ଜୟ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ବଧ କରିବା ଇଚ୍ଛାରେ ତାଙ୍କ ଉପରେ ବାଣବର୍ଷା କଲେ।
Verse 13
स तान् ज्यामुखनिर्मुक्तिबहुभि: सुबहून् शरान् । चिच्छेद पाण्डवो राजंस्ते भूमौ न्न्यपतंस्तदा,राजन! पाण्डुपुत्र अर्जुनने अपने धनुषकी प्रत्यंचासे छूटे हुए बहुसंख्यक बाणोंद्वारा शत्रुओंके बहुत-से बाणोंको काट डाला। वे कटे हुए बाण टुकड़े-टुकड़े होकर पृथ्वीपर गिर पड़े
ରାଜନ! ପାଣ୍ଡବ ଅର୍ଜୁନ ଧନୁଷ୍ୟର ପ୍ରତ୍ୟଞ୍ଚାରୁ ମୁକ୍ତ ଅନେକ ବାଣଦ୍ୱାରା ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କର ବହୁ ବାଣ କାଟିଦେଲେ; ସେ କଟା ବାଣଗୁଡ଼ିକ ଖଣ୍ଡଖଣ୍ଡ ହୋଇ ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଲା।
Verse 14
केतुवर्मा तु तेजस्वी तस्यैवावरजो युवा । युयुधे भ्रातुरर्थाय पाण्डवेन यशस्विना,(सूर्यवर्माके परास्त होनेपर) उसका छोटा भाई केतुवर्मा जो एक तेजस्वी नवयुवक था, अपने भाईका बदला लेनेके लिये यशस्वी वीर पाण्डुपुत्र अर्जुनके साथ युद्ध करने लगा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସୂର୍ଯ୍ୟବର୍ମା ପରାଜିତ ହେବା ପରେ, ତାହାର ଛୋଟ ଭାଇ ତେଜସ୍ବୀ ଯୁବ କେତୁବର୍ମା, ଭାଇର ପକ୍ଷ ଧରିବା ଓ ପ୍ରତିଶୋଧ ନେବା ପାଇଁ ଯଶସ୍ବୀ ପାଣ୍ଡବ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କଲା।
Verse 15
तमापततन्तं सम्प्रेक्ष्य केतुवर्माणमाहवे । अभ्यष्नन्निशितैर्बाणैर्बीभत्सु: परवीरहा,केतुवर्माको युद्धस्थलमें धावा करते देख शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनने अपने तीखे बाणोंसे उसे मार डाला
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯୁଦ୍ଧକ୍ଷେତ୍ରରେ କେତୁବର୍ମାକୁ ଧାଉଥିବା ଦେଖି, ପରବୀରହନ୍ତା ବୀଭତ୍ସୁ ଅର୍ଜୁନ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ବାଣରେ ତାକୁ ଆଘାତ କରି ଭୂମିରେ ପତିତ କଲେ।
Verse 16
केतुवर्मण्यभिहते धृतवर्मा महारथ: । रथेनाशु समुत्पत्य शरैर्जिष्णुमवाकिरत्,केतुवर्माके मारे जानेपर महारथी धृतवर्मा रथके द्वारा शीघ्र ही वहाँ आ धमका और अर्जुनपर बाणोंकी वर्षा करने लगा
କେତୁବର୍ମା ଆହତ ହୋଇ ପତିତ ହେବା ପରେ, ମହାରଥୀ ଧୃତବର୍ମା ରଥେ ଶୀଘ୍ର ଆଗେଇ ଆସି ଜିଷ୍ଣୁ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ଉପରେ ବାଣବର୍ଷା କଲା।
Verse 17
तस्य तां शीघ्रतामीक्ष्य तुतोषातीव वीर्यवान् । गुडाकेशो महातेजा बालस्य धृतवर्मण:
ତାହାର ସେଇ ଶୀଘ୍ରତା ଦେଖି, ମହାତେଜସ୍ବୀ ପରାକ୍ରମୀ ଗୁଡାକେଶ ଅର୍ଜୁନ ବାଳକ ଧୃତବର୍ମା ଉପରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରସନ୍ନ ହେଲେ।
Verse 18
धृतवर्मा अभी बालक था तो भी उसकी उस फुर्तीको देखकर महातेजस्वी पराक्रमी अर्जुन बड़े प्रसन्न हुए ।। न संदधानं ददृशे नाददानं च तं तदा । किरन्तमेव स शरान् ददृशे पाकशासनि:,वह कब बाण हाथमें लेता है और कब उसे धनुषपर चढ़ाता है, उसको इन्द्रकुमार अर्जुन भी नहीं देख पाते थे। उन्हें केवल इतना ही दिखायी देता था कि वह बाणोंकी वर्षा कर रहा है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେତେବେଳେ ପାକଶାସନି ଇନ୍ଦ୍ରପୁତ୍ର ଅର୍ଜୁନ ମଧ୍ୟ ଦେଖିପାରିଲେ ନାହିଁ—ସେ କେବେ ବାଣ ହାତରେ ନେଉଛି, କେବେ ଧନୁଷରେ ଚଢ଼ାଉଛି; ଅର୍ଜୁନ କେବଳ ଏତିକି ଦେଖିଲେ ଯେ ସେ ଅବିରତ ବାଣବର୍ଷା କରୁଛି।
Verse 19
स तु त॑ पूजयामास धृतवर्माणमाहवे । मनसा तु मुहूर्त वै रणे समभिहर्षयन्,उन्होंने रणभूमिमें थोड़ी देरतक मन-ही-मन धृतवर्माकी प्रशंसा की और युद्धमें उसका हर्ष एवं उत्साह बढ़ाते रहे
ସେ ରଣଭୂମିରେ ଧୃତବର୍ମାଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ କଲେ ଏବଂ କିଛିକ୍ଷଣ ମନେମନେ ତାଙ୍କ ପ୍ରଶଂସା କରି ଯୁଦ୍ଧମଧ୍ୟରେ ତାଙ୍କର ହର୍ଷ ଓ ଉତ୍ସାହକୁ ବଢ଼ାଇଲେ।
Verse 20
त॑ं पन्नगमिव क्रुद्धं कुरुवीर: स्मयन्निव । प्रीतिपूर्व महाबाहु: प्राणैर्न व्यपरोपयत्,यद्यपि धृतवर्मा सर्पके समान क्रोधमें भरा हुआ था तो भी कुरुवीर महाबाहु अर्जुन प्रेमपूर्वक मुसकराते हुए युद्ध करते थे। उन्होंने उसके प्राण नहीं लिये
ଧୃତବର୍ମା ସର୍ପ ପରି କ୍ରୋଧାନ୍ୱିତ ଥିଲେ ମଧ୍ୟ, କୁରୁବୀର ମହାବାହୁ ଅର୍ଜୁନ ପ୍ରୀତିପୂର୍ବକ ମନ୍ଦ ହାସ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କଲେ; ତାଙ୍କ ପ୍ରାଣ ନେଲେ ନାହିଁ।
Verse 21
स तथा रक्ष्यमाणो वै पार्थनामिततेजसा । धृतवर्मा शरं दीप्त॑ मुमोच विजये तदा,इस प्रकार अमित तेजस्वी अर्जुनके द्वारा जानबूझकर छोड़ दिये जानेपर धृतवर्माने उनके ऊपर एक अत्यन्त प्रज्वलित बाण चलाया
ଏପରି ଅମିତତେଜସ୍ୱୀ ପାର୍ଥ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଜାଣିଶୁଣି ରକ୍ଷିତ ହେଉଥିବା ସତ୍ତ୍ୱେ, ଧୃତବର୍ମା ସେହି ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ ବିଜୟଲାଲସାରେ ତାଙ୍କ ଉପରେ ଜ୍ୱଳନ୍ତ ଶର ଛାଡ଼ିଲେ।
Verse 22
स तेन विजयस्तूर्णमासीद् विद्धा: करे भृशम् । मुमोच गाण्डिवं मोहात् तत् पपाताथ भूतले,उस बाणने तुरन्त आकर अर्जुनके हाथमें गहरी चोट पहुँचायी। उन्हें मूर्च्छा आ गयी और उनका गाण्डीव धनुष हाथसे छूटकर पृथ्वीपर जा पड़ा
ସେହି ଶରରେ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ହାତ ଭୟଙ୍କର ଭାବେ ବିଦ୍ଧ ହେଲା; ମୋହ ଓ ମୂର୍ଛାରେ ସେ ଗାଣ୍ଡୀବ ଛାଡ଼ିଦେଲେ, ଏବଂ ଧନୁଷ ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଗଲା।
Verse 23
धनुष: पततस्तस्य सव्यसाचिकराद् विभो | बभूव सदृशं रूप॑ं शक्रचापस्य भारत,प्रभो! भरतनन्दन! अर्जुनके हाथसे गिरते हुए उस धनुषका रूप इन्द्रधनुषके समान प्रतीत होता था
ହେ ପ୍ରଭୋ, ହେ ଭାରତନନ୍ଦନ! ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ହାତରୁ ପଡ଼ୁଥିବା ସେହି ଧନୁଷର ରୂପ ଶକ୍ରଚାପ—ଇନ୍ଦ୍ରଧନୁ—ସଦୃଶ ଦେଖାଯାଉଥିଲା।
Verse 24
तस्मिन् निपतिते दिव्ये महाधनुषि पार्थिव: । जहास सस्वनं हासं धृतवर्मा महाहवे,उस दिव्य महाधनुषके गिर जानेपर महासमरमें खड़ा हुआ धृतवर्मा ठहाका मारकर जोर-जोरसे हँसने लगा
ସେଇ ଦିବ୍ୟ ମହାଧନୁଷ ଭୂମିରେ ପତିତ ହେବାମାତ୍ରେ, ମହାସମର ମଧ୍ୟରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଧୃତବର୍ମା ଉଚ୍ଚ ସ୍ୱରରେ ଠହାକା ମାରି ହସି ପକାଇଲା।
Verse 25
ततो रोषार्दितो जिष्णु: प्रमृज्य रुधिरं करात् । धनुरादत्त तद् दिव्यं शरवर्षैववर्ष च,इससे अर्जुनका रोष बढ़ गया। उन्होंने हाथसे रक्त पोंछकर उस दिव्य धनुषको पुनः उठा लिया और धृतवर्मापर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी
ତେବେ କ୍ରୋଧାବିଷ୍ଟ ଜିଷ୍ଣୁ (ଅର୍ଜୁନ) ହାତରୁ ରକ୍ତ ପୋଛି, ସେଇ ଦିବ୍ୟ ଧନୁଷକୁ ପୁନଃ ଉଠାଇଲେ ଏବଂ ଧୃତବର୍ମା ଉପରେ ଶରବର୍ଷା ଆରମ୍ଭ କଲେ।
Verse 26
ततो हलहलाशब्दो दिवस्पृणभवत् तदा । नानाविधानां भूतानां तत्कर्माणि प्रशंसताम्,फिर तो अर्जुनके उस पराक्रमकी प्रशंसा करते हुए नाना प्रकारके प्राणियोंका कोलाहल समूचे आकाशकमें व्याप्त हो गया
ତାପରେ ‘ହଲହଲା’ ଶବ୍ଦର ମହାକୋଳାହଳ ଆକାଶକୁ ଛୁଇଁଲା ପରି ବ୍ୟାପିଗଲା; ନାନାପ୍ରକାର ଭୂତଗଣ ସେଇ କର୍ମ (ପରାକ୍ରମ)କୁ ପ୍ରଶଂସା କରିଲେ।
Verse 27
ततः सम्प्रेक्ष्य संक्रुद्धें कालान्तकयमोपमम् । जिष्णु त्रैगर्तका योधा: परीता: पर्यवारयन्,अर्जुनको काल, अन्तक और यमराजके समान कुपित हुआ देख त्रिगर्तदेशीय योद्धाओंने चारों ओरसे आकर उन्हें घेर लिया
ତେବେ କାଳ, ଅନ୍ତକ ଓ ଯମ ସମାନ କ୍ରୁଦ୍ଧ ଜିଷ୍ଣୁ (ଅର୍ଜୁନ)କୁ ଦେଖି, ତ୍ରୈଗର୍ତ୍ତ ଯୋଧାମାନେ ଚାରିଦିଗରୁ ଆସି ତାଙ୍କୁ ଘେରିଲେ।
Verse 28
अभिसृत्य परीप्सार्थ ततस्ते धृतवर्मण: । परिवत्रुर्गुडाकेशं तत्राक्रुद्धादू धनंजय:,धृतवर्माकी रक्षाके लिये सहसा आक्रमण करके त्रिगर्तोने गुडाकेश अर्जुनको जब सब ओरसे घेर लिया, तब उन्हें बड़ा क्रोध हुआ
ତାପରେ ଧୃତବର୍ମାଙ୍କ ରକ୍ଷା ପାଇଁ ଏବଂ ତାଙ୍କୁ ଧରିବା ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ସେମାନେ ଝପଟି ପଡ଼ି ଗୁଡାକେଶ (ଅର୍ଜୁନ)କୁ ସବୁଦିଗରୁ ଘେରିଲେ; ସେଠାରେ ଧନଞ୍ଜୟ ଭୟଙ୍କର କ୍ରୋଧିତ ହେଲେ।
Verse 29
ततो योधान् जघानाशु तेषां स दश चाष्ट च । महेन्द्रवज़प्रतिमैरायसैर्बहुभि: शरै:,फिर तो उन्होंने इन्द्रके वजकी भाँति दुस्सह लौहनिर्मित बहुसंख्यक बाणोंद्वारा बात- की-बातमें उनके अठारह प्रमुख योद्धाओंको यमलोक पहुँचा दिया
ତାପରେ ସେ ଇନ୍ଦ୍ରର ବଜ୍ର ସମ ଅସହ୍ୟ, ଲୋହାରେ ନିର୍ମିତ ଅସଂଖ୍ୟ ଶରଦ୍ୱାରା କ୍ଷଣମାତ୍ରେ ତାଙ୍କର ଦଶ ଓ ଆଠ—ଅର୍ଥାତ୍ ଅଠାର ଜଣ ପ୍ରମୁଖ ଯୋଦ୍ଧାଙ୍କୁ ଯମଲୋକକୁ ପଠାଇଦେଲେ।
Verse 30
तान् सम्प्रभग्नान् सम्प्रेक्ष्य त्वरमाणो धनंजय: । शरैराशीविषाकारैर्जघान स्वनवद्धसन्,तब तो त्रिगर्तोंमें भगदड़ मच गयी। उन्हें भागते देख अर्जुनने जोर-जोरसे हँसते हुए बड़ी उतावलीके साथ सर्पाकार बाणोंद्वारा उन सबको मारना आरम्भ किया
ସେମାନେ ପରାଜିତ ହୋଇ ପଳାଉଛନ୍ତି ବୋଲି ଦେଖି ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ତ୍ୱରାନ୍ୱିତ ହୋଇ ଆଗକୁ ବଢ଼ିଲେ ଏବଂ ଉଚ୍ଚସ୍ୱରେ ହସିହସି ବିଷଧର ସର୍ପାକାର ଶରଦ୍ୱାରା ସେମାନଙ୍କୁ ମାରିବାକୁ ଆରମ୍ଭ କଲେ।
Verse 31
ते भग्नमनस: सर्वे त्रैगर्तकमहारथा: । दिशोभिदुद्रुवू राजन् धनंजयशरार्दिता:,राजन! धनंजयके बाणोंसे पीड़ित हुए समस्त त्रिगर्तदेशीय महारथियोंका युद्धविषयक उत्साह नष्ट हो गया; अतः वे चारों दिशाओंमें भाग चले
ହେ ରାଜନ! ଧନଞ୍ଜୟଙ୍କ ଶରଦ୍ୱାରା ଆର୍ଦ୍ଦିତ ତ୍ରିଗର୍ତ୍ତଦେଶୀୟ ସେ ସମସ୍ତ ମହାରଥୀଙ୍କର ମନୋବଳ ଭାଙ୍ଗିଗଲା; ତେଣୁ ସେମାନେ ଚାରିଦିଗକୁ ଦୌଡ଼ି ପଳାଇଲେ।
Verse 32
तमूचु: पुरुषव्याप्रं संशप्तकनिषूदनम् । तवास्म किंकरा: सर्वे सर्वे वै वशगास्तव,उनमेंसे कितने ही संशप्तकसूदन पुरुषसिंह अर्जुनसे इस प्रकार कहने लगे --'कुन्तीनन्दन! हम सब आपके आज्ञाकारी सेवक हैं और सभी सदा आपके अधीन रहेंगे
ତେବେ ସେମାନେ ପୁରୁଷବ୍ୟାଘ୍ର, ସଂଶପ୍ତକନିଷୂଦନ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ କହିଲେ—“ଆମେ ସମସ୍ତେ ଆପଣଙ୍କର କିଙ୍କର; ଆମେ ସମସ୍ତେ ନିଶ୍ଚୟ ଆପଣଙ୍କ ବଶଗତ।”
Verse 33
आज्ञापयस्व न: पार्थ प्रद्दान् प्रेष्यानवस्थितान् । करिष्याम: प्रियं सर्व तव कौरवनन्दन,'पार्थ!! हम सभी सेवक विनीत भावसे आपके सामने खड़े हैं। आप हमें आज्ञा दें। कौरवनन्दन! हम सब लोग आपके समस्त प्रिय कार्य सदा करते रहेंगे”
“ହେ ପାର୍ଥ! ଆମକୁ ଆଜ୍ଞା ଦିଅନ୍ତୁ; ନିଯୁକ୍ତ ପ୍ରେଷ୍ୟ ଭାବେ ଆମେ ବିନୟରେ ଏଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ। ହେ କୌରବନନ୍ଦନ! ଆପଣଙ୍କ ସମସ୍ତ ପ୍ରିୟ କାର୍ଯ୍ୟ ଆମେ କରିବୁ।”
Verse 34
एतदाज्ञाय वचन सर्वास्तानब्रवीत् तदा । जीवितं रक्षत नृपा: शासन प्रतिगृह्यताम्,उनकी ये बातें सुनकर अर्जुनने उनसे कहा--'राजाओ! अपने प्राणोंकी रक्षा करो। इसका एक ही उपाय है, हमारा शासन स्वीकार कर लो”
ପରିସ୍ଥିତିର ଅର୍ଥ ବୁଝି ସେ ତେବେ ସମସ୍ତ ରାଜାଙ୍କୁ କହିଲେ—“ହେ ନୃପମାନେ, ନିଜ ପ୍ରାଣ ରକ୍ଷା କର। ତୁମମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଏକମାତ୍ର ପଥ—ଆମ ଶାସନ ଗ୍ରହଣ କର।”
Verse 74
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि त्रिगर्तपरा भवे चतुःसप्ततितमो<ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଆଶ୍ୱମେଧିକ ପର୍ବର ଅନୁଗୀତା ପର୍ବରେ ତ୍ରିଗର୍ତ୍ତମାନଙ୍କ ପରାଭବ-ବିଷୟକ ଚତୁଃସପ୍ତତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Whether Prāgjyotiṣa will acknowledge the Aśvamedha’s implied suzerainty or contest it; the engagement functions as a public mechanism for validating political hierarchy under ritual law.
Power is to be exercised instrumentally and proportionately: Arjuna’s role is protection and stabilization of the ritual mandate, while the challenger’s response tests legitimacy within recognized norms of kṣatriya conduct.
No explicit phalaśruti appears in the provided verses; the meta-significance is implicit—this episode exemplifies how post-war order is reconstituted through ritualized diplomacy backed by controlled force.