
Adhyāya 62: Marutta’s Treasure and the Pāṇḍavas’ Auspicious Departure (मरुत्तस्य धनप्राप्त्युपक्रमः)
Upa-parva: Ratna-Āharaṇa (Marutta’s Hidden Treasure) Episode
Janamejaya asks Vaiśaṃpāyana what Yudhiṣṭhira did after hearing Vyāsa’s statement concerning the Aśvamedha and how Marutta’s buried treasure was obtained. Vaiśaṃpāyana reports that Yudhiṣṭhira, having heard the counsel, convenes all brothers—Arjuna, Bhīma, and the twins—and reminds them that the guidance came from trusted authorities acting for Kuru welfare (Vyāsa, Bhīṣma, and Kṛṣṇa). He notes the scarcity of wealth in the world and proposes collective retrieval of Marutta’s treasure, inviting Bhīma’s view. Bhīma endorses the plan, reasoning that if the treasure is secured the sacrificial objective is effectively accomplished; he recommends approaching Girīśa/Maheśvara with reverence and worship so that even the fierce guardians of the treasure become manageable through divine favor. The brothers assent, fix an auspicious day and constellation, order the army, and depart after arranging blessings from brāhmaṇas, worshiping Maheśvara in advance, distributing and offering foods, and receiving auspicious benedictions from priests and townspeople. They circumambulate and bow to brāhmaṇas with sacred fires, then formally take leave of Dhṛtarāṣṭra (grief-stricken), Pṛthā, and Yuyutsu, proceeding with public honor and ritual propriety.
Chapter Arc: अभिमन्यु-वियोग की ज्वाला अभी बुझी नहीं—यादवों में वसुदेव-केशव सहित सब शोकाकुल हैं और पाण्डवों के हृदय में भी वही रिक्तता गूँज रही है। → वसुदेव और श्रीकृष्ण अपने प्रिय भानजे अभिमन्यु के निमित्त और्ध्वदेहिक कर्म करते हैं; असंख्य ब्राह्मणों को विधिपूर्वक भोजन कराकर दान-धर्म होता है, पर शान्ति नहीं आती—कर्मकाण्ड सम्पन्न होकर भी मन का घाव खुला रहता है। उधर उत्तरा का शोक और भविष्य की अनिश्चितता (वंश-दीप का प्रश्न) भीतर-भीतर सभा को और भारी बनाती है। → दिव्यदृष्टि से स्थिति जानकर महर्षि व्यास का आगमन—वे उत्तरा को शोक त्यागने का आदेश देते हैं और आश्वासन देते हैं कि उसका यशस्वी, महातेजस्वी पुत्र होगा; साथ ही वे गर्भस्थ शिशु (परीक्षित) के विकास का संकेत देकर वंश-रक्षा का ध्रुव सत्य स्थापित करते हैं। → व्यास युधिष्ठिर को अश्वमेध यज्ञ के लिए प्रेरित करते हैं—शोक से राज्य-धर्म की ओर, निजी क्षति से लोक-कल्याण की ओर मन को मोड़ते हैं; उपदेश देकर वे अंतर्धान हो जाते हैं, और कथा का रुख पुनर्निर्माण (राजधर्म/यज्ञ) की दिशा में स्थिर होता है। → युधिष्ठिर क्या शोक के भार को पार कर अश्वमेध का संकल्प ले पाएँगे—और यह यज्ञ पाण्डव-राज्य को किस प्रकार नई परीक्षा में डालेगा?
Verse 1
अफ-्-रू- >> द्विषष्टितमो<5 ध्याय: वसुदेव आदि यादवोंका अभिमन्युके निमित्त श्राद्ध करना तथा व्यासजीका उत्तरा और अर्जुनको समझाकर युधिष्ठिरको अश्वमेधयज्ञ करनेकी आज्ञा देना वैशम्पायन उवाच एतच्छुत्वा तु पुत्रस्य वच: शूरात्मजस्तदा । विहाय शोक धर्मात्मा ददौ श्राद्धमनुत्तमम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! अपने पुत्र श्रीकृष्णकी बात सुनकर शूरपुत्र धर्मात्मा वसुदेवजीने शोक त्याग दिया और अभिमन्युके लिये परम उत्तम श्राद्धवेिषयक दान दिया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ପୁତ୍ରର ବଚନ ଶୁଣି ଶୂରପୁତ୍ର ଧର୍ମାତ୍ମା ବସୁଦେବ ଶୋକ ତ୍ୟାଗ କରି, ଅଭିମନ୍ୟୁଙ୍କ ନିମିତ୍ତେ ପରମ ଉତ୍ତମ ଶ୍ରାଦ୍ଧ-ଦାନ କଲେ।
Verse 2
तथैव वासुदेवश्च स्वस्रीयस्य महात्मन: । दयितस्य पितुर्नित्यमकरोदौर्ध्वदेहिकम्,इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने भी अपने महामनस्वी भानजे अभिमन्युका, जो उनके पिता वसुदेवजीका सदा ही परम प्रिय रहा, श्राद्धकर्म सम्पन्न किया
ସେହିପରି ବାସୁଦେବ (କୃଷ୍ଣ) ମଧ୍ୟ ନିଜ ଭଉଣୀଙ୍କ ମହାତ୍ମ ପୁତ୍ର—ଯେ ତାଙ୍କ ପିତାଙ୍କୁ ସଦା ପ୍ରିୟ ଥିଲେ—ତାଙ୍କ ପାଇଁ ନିୟମିତ ଭାବେ ଔର୍ଧ୍ୱଦେହିକ (ଶ୍ରାଦ୍ଧ ଆଦି) କର୍ମ କଲେ।
Verse 3
षष्टिं शतसहस्तराणि ब्राह्मणानां महौजसाम् | विधिवद् भोजयामास भोज्यं सर्वगुणान्वितम्,उन्होंने साठ लाख महातेजस्वी ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक सर्वगुणसम्पन्न उत्तम अन्न भोजन कराया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେ ବିଧିପୂର୍ବକ ଷାଠି ଲକ୍ଷ ମହାତେଜସ୍ବୀ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କୁ ସର୍ବଗୁଣସମ୍ପନ୍ନ ଉତ୍ତମ ଭୋଜନ କରାଇଲେ।
Verse 4
आच्छाद्य च महाबाहुर्धनतृष्णामपानुदत् । ब्राह्मणानां तदा कृष्णस्तद भूल्लोमहर्षणम्,महाबाहु श्रीकृष्णने उस समय ब्राह्मणोंको वस्त्र पहनाकर इतना धन दिया, जिससे उनकी धनविषयक तृष्णा दूर हो गयी। यह एक रोमांचकारी घटना थी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତେବେ ମହାବାହୁ କୃଷ୍ଣ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ବସ୍ତ୍ର ପରାଇ ଏତେ ଧନ ଦାନ କଲେ ଯେ ତାଙ୍କର ଧନତୃଷ୍ଣା ଶମିଗଲା; ସେ କାର୍ଯ୍ୟ ସତ୍ୟେ ରୋମାଞ୍ଚକର ଥିଲା।
Verse 5
सुवर्ण चैव गाश्नैव शयनाच्छादनानि च | दीयमानं तदा विप्रा वर्धतामिति चाब्रुवन्,ब्राह्मणलोग सुवर्ण, गौ, शय्या और वस्त्रका दान पाकर अभ्युदय होनेका आशीर्वाद देने लगे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତେବେ ସୁବର୍ଣ୍ଣ, ଗୋ, ଶୟ୍ୟା ଓ ବସ୍ତ୍ର ଦାନ ହେଉଥିବାବେଳେ, ସେଗୁଡ଼ିକ ଗ୍ରହଣ କରି ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଆଶୀର୍ବାଦ କଲେ—“ବର୍ଧତାଂ—ଆପଣମାନେ ବୃଦ୍ଧି ପାଆନ୍ତୁ।”
Verse 6
वासुदेवो5थ दाशाहों बलदेव: ससात्यकि: । अभिमन्योस्तदा श्राद्धमकुर्वन् सत्यकस्तदा,भगवान् श्रीकृष्ण, बलदेव, सत्यक और सात्यकिने भी उस समय अभिमन्युका श्राद्ध किया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ବାସୁଦେବ (କୃଷ୍ଣ), ଦାଶାର୍ହ ବଳଦେବ ଓ ସାତ୍ୟକି ସେ ସମୟରେ ଅଭିମନ୍ୟୁଙ୍କ ଶ୍ରାଦ୍ଧ କଲେ।
Verse 7
अतीव दुःखसंतप्ता न शमं चोपलेभिरे | तथैव पाण्डवा वीरा नगरे नागसाह्वये
ଅତ୍ୟଧିକ ଦୁଃଖରେ ଦଗ୍ଧ ହୋଇ ସେମାନେ ଶାନ୍ତି ପାଇଲେ ନାହିଁ; ସେହିପରି ନାଗସାହ୍ୱୟ ନଗରରେ ପାଣ୍ଡବ ବୀରମାନେ ମଧ୍ୟ ମନଶ୍ଶାନ୍ତି ଲଭିଲେ ନାହିଁ।
Verse 8
सुबहूनि च राजेन्द्र दिवसानि विराटजा,राजेन्द्र! विराटकुमारी उत्तराने पतिके दुःखसे आतुर हो बहुत दिनोंतक भोजन ही नहीं किया। उसकी वह दशा बड़ी ही करुणाजनक थी। उसके गर्भका बालक उदरहीमें पड़ा- पड़ा क्षीण होने लगा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ବହୁ ଦିନ ଧରି ବିରାଟଙ୍କ କନ୍ୟା, ବିରାଟକୁମାରୀ ଉତ୍ତରା, ପତିଶୋକରେ ଆତୁର ହୋଇ ଭୋଜନ କରିନଥିଲେ। ତାଙ୍କ ଅବସ୍ଥା ଅତ୍ୟନ୍ତ କରୁଣ ହେଲା, ଏବଂ ଗର୍ଭସ୍ଥ ଶିଶୁ ମଧ୍ୟ ଉଦରଭିତରେ ଥିବାବେଳେ କ୍ଷୀଣ ହେବାକୁ ଲାଗିଲା।
Verse 9
नाभुड्क्त पतिदु:खार्ता तदभूत् करुणं महत् | कुक्षिस्थ एव तस्याथ गर्भो वै सम्प्रलीयत,राजेन्द्र! विराटकुमारी उत्तराने पतिके दुःखसे आतुर हो बहुत दिनोंतक भोजन ही नहीं किया। उसकी वह दशा बड़ी ही करुणाजनक थी। उसके गर्भका बालक उदरहीमें पड़ा- पड़ा क्षीण होने लगा
ପତିଦୁଃଖରେ ଆତୁର ହୋଇ ସେ ଭୋଜନ କଲେ ନାହିଁ; ତେଣୁ ତାଙ୍କ ଅବସ୍ଥା ମହାକରୁଣ ହେଲା। ତାପରେ, ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର, ତାଙ୍କ କୁକ୍ଷିସ୍ଥ ଗର୍ଭ ମଧ୍ୟ ଉଦରଭିତରେ ଥିବାବେଳେ କ୍ଷୟ ହେବାକୁ ଲାଗିଲା।
Verse 10
आजगाम ततो व्यासो ज्ञात्वा दिव्येन चक्षुषा । समागम्याब्रवीद् धीमान् पृथां पृुथुललोचनाम्,उसकी इस दशाको दिव्य दृष्टिसे जानकर महान् तेजस्वी बुद्धिमान् महर्षि व्यास वहाँ आये और विशाल नेत्रोंवाली कुन्ती तथा उत्तरासे मिलकर उन्हें समझाते हुए इस प्रकार बोले--'यशस्विनि उत्तरे! तुम यह शोक त्याग दो। तुम्हारा पुत्र महातेजस्वी होगा
ତାପରେ ଦିବ୍ୟ ଚକ୍ଷୁରେ ସେହି ଅବସ୍ଥା ଜାଣି ମହାତେଜସ୍ବୀ ବୁଦ୍ଧିମାନ ମହର୍ଷି ବ୍ୟାସ ସେଠାକୁ ଆସିଲେ। ସେ ବିଶାଳନେତ୍ରୀ ପୃଥା (କୁନ୍ତୀ)ଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ, ଉତ୍ତରାଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଭେଟି, ଶୋକ ନିବାରଣ ପାଇଁ ଏହିପରି କହିଲେ—“ଯଶସ୍ବିନୀ ଉତ୍ତରେ! ଏହି ଶୋକ ତ୍ୟାଗ କର; ତୋର ପୁତ୍ର ମହାତେଜସ୍ବୀ ହେବ।”
Verse 11
उत्तरां च महातेजा: शोक: संत्यज्यतामयम् | भविष्यति महातेजा: पुत्रस्तव यशस्विनि,उसकी इस दशाको दिव्य दृष्टिसे जानकर महान् तेजस्वी बुद्धिमान् महर्षि व्यास वहाँ आये और विशाल नेत्रोंवाली कुन्ती तथा उत्तरासे मिलकर उन्हें समझाते हुए इस प्रकार बोले--'यशस्विनि उत्तरे! तुम यह शोक त्याग दो। तुम्हारा पुत्र महातेजस्वी होगा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯଶସ୍ବିନୀ ଉତ୍ତରେ! ଏହି ଶୋକ ତ୍ୟାଗ କର। ତୋର ପୁତ୍ର ମହାତେଜସ୍ବୀ ହେବ।
Verse 12
प्रभावाद् वासुदेवस्य मम व्याहरणादपि । पाण्डवानामयं चान्ते पालयिष्यति मेदिनीम्,“भगवान् श्रीकृष्णके प्रभावसे और मेरे आशीर्वादसे वह पाण्डवोंके बाद सम्पूर्ण पृथ्वीका पालन करेगा”
ବାସୁଦେବଙ୍କ ଦିବ୍ୟ ପ୍ରଭାବରେ ଏବଂ ମୋର ବଚନ-ଆଶୀର୍ବାଦର ବଳରେ ମଧ୍ୟ, ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପରେ ଶେଷରେ ଏହିଜଣ ପୃଥିବୀକୁ ପାଳନ ଓ ରକ୍ଷା କରିବ।
Verse 13
धनंजयं च सम्प्रेक्ष्य धर्मराजस्य शृण्वत: । व्यासो वाक्यमुवाचेदं हर्षयन्निव भारत,भारत! तत्पश्चात् व्यासजीने धर्मराज युधिष्ठिरको सुनाते हुए अर्जुनकी ओर देखकर उनका हर्ष बढ़ाते हुए-से कहा--
ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଶୁଣୁଥିବାବେଳେ, ବ୍ୟାସ ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ)ଙ୍କୁ ଦେଖି, ଯେନେ ତାଙ୍କୁ ହର୍ଷିତ କରିବାକୁ—ହେ ଭାରତ—ଏହି କଥା କହିଲେ।
Verse 14
पौत्रस्तव महाभागो जनिष्यति महामना: । पृथ्वीं सागरपर्यन्तां पालयिष्यति धर्मत:,“कुरुश्रेष्ठ! तुम्हें महान् भाग्यशाली और महामनस्वी पौत्र होनेवाला है, जो समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीका धर्मत: पालन करेगा; अतः शत्रुसूदन! तुम शोक त्याग दो। इसमें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। मेरा यह कथन सत्य होगा
ହେ କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ! ତୁମର ଏକ ମହାଭାଗ୍ୟଶାଳୀ, ମହାମନା ପୌତ୍ର ଜନ୍ମିବ; ସେ ଧର୍ମାନୁସାରେ ସମୁଦ୍ରପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ପାଳନ କରିବ। ତେଣୁ, ହେ ଶତ୍ରୁସୂଦନ, ଶୋକ ତ୍ୟାଗ କର; ଏଥିରେ ଆଉ ବିଚାର ଦରକାର ନାହିଁ—ମୋ କଥା ସତ୍ୟ ହେବ।
Verse 15
तस्माच्छोकं कुरुश्रेष्ठ जहि त्वमरिकर्शन । विचार्यमत्र न हि ते सत्यमेतद् भविष्यति,“कुरुश्रेष्ठ! तुम्हें महान् भाग्यशाली और महामनस्वी पौत्र होनेवाला है, जो समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीका धर्मत: पालन करेगा; अतः शत्रुसूदन! तुम शोक त्याग दो। इसमें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। मेरा यह कथन सत्य होगा
ଏହେତୁ, ହେ କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ, ହେ ଅରିକର୍ଷଣ, ଶୋକ ତ୍ୟାଗ କର। ଏଥିରେ ତୁମକୁ ବିଚାର କରିବାର ଆବଶ୍ୟକତା ନାହିଁ; ମୋର ଏହି କଥା ନିଶ୍ଚୟ ସତ୍ୟ ହେବ।
Verse 16
यच्चापि वृष्णिवीरेण कृष्णेन कुरुनन्दन । पुरोक्त तत् तथा भावि मा तेअत्रास्तु विचारणा,“कुरुनन्दन! वृष्णिवंशके वीर पुरुष भगवान् श्रीकृष्णने पहले जो कुछ कहा है, वह सब वैसा ही होगा। इस विषयमें तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये
ହେ କୁରୁନନ୍ଦନ! ବୃଷ୍ଣିବଂଶର ବୀର କୃଷ୍ଣ ପୂର୍ବରୁ ଯାହା କହିଥିଲେ, ସେସବୁ ଠିକ୍ ସେହିପରି ହେବ। ଏଥିରେ ତୁମର କୌଣସି ସନ୍ଦେହ କିମ୍ବା ଅନ୍ୟଥା ଚିନ୍ତା ରହିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ।
Verse 17
विबुधानां गतो लोकानक्षयानात्मनिर्जितान् । न स शोच्यस्त्वया वीरो न चान्यै: कुरुभिस्तथा,“वीर अभिमन्यु अपने पराक्रमसे उपार्जित किये हुए देवताओंके अक्षय लोकोंमें गया है; अतः उसके लिये तुम्हें या अन्य कुरुवंशियोंको क्षोभ नहीं करना चाहिये”
ସେ ବୀର ନିଜ ପରାକ୍ରମରେ ଅର୍ଜିତ ଦେବତାମାନଙ୍କ ଅକ୍ଷୟ ଲୋକକୁ ଗଲା; ତେଣୁ ତୁମେ ତାଙ୍କ ପାଇଁ ଶୋକ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ, ଅନ୍ୟ କୁରୁମାନେ ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ।
Verse 18
एवं पितामहेनोक्तो धर्मात्मा स धनंजय: । त्यक्त्वा शोक॑ महाराज हृष्टरूपो5भवत् तदा,महाराज! अपने पितामह व्यासजीके द्वारा इस प्रकार समझाये जानेपर धर्मात्मा अर्जुनने शोक त्यागकर संतोषका आश्रय लिया
ହେ ମହାରାଜ! ପିତାମହ ବ୍ୟାସ ଏପରି ଉପଦେଶ ଦେଇଥିବାରୁ ଧର୍ମାତ୍ମା ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ଶୋକ ତ୍ୟାଗ କରି ସେହି ସମୟରେ ପ୍ରସନ୍ନଚିତ୍ତ ଓ ହର୍ଷିତ ହେଲେ।
Verse 19
पितापि तव धर्मज्ञ गर्भ तस्मिन् महामते । अवर्धत यथाकामं शुक्लपक्षे यथा शशी,धर्मज्ञ! महामते! उस समय तुम्हारे पिता परीक्षित् शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति यथेष्ट वृद्धि पाने लगे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଧର୍ମଜ୍ଞ, ହେ ମହାମତି! ସେହି ଗର୍ଭରେ ତୁମ ପିତା ମଧ୍ୟ ଶୁକ୍ଳପକ୍ଷର ଚନ୍ଦ୍ରମା ପରି ଇଚ୍ଛାମତେ ବୃଦ୍ଧି ଓ ପୁଷ୍ଟି ଲାଭ କରୁଥିଲେ।
Verse 20
ततः: संचोदयामास व्यासो धर्मात्मजं नृपम् अश्वमेधं प्रति तदा तत: सो<न्तर्हितो5भवत्,तदनन्तर व्यासजीने धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरको अश्वमेध यज्ञ करनेके लिये आज्ञा दी और स्वयं वहाँसे अदृश्य हो गये
ତାପରେ ବ୍ୟାସ ଧର୍ମପୁତ୍ର ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଅଶ୍ୱମେଧ ଯଜ୍ଞ କରିବାକୁ ପ୍ରେରିତ କଲେ; ଏହିପରି କହି ସେ ସ୍ଥାନରୁ ଅନ୍ତର୍ଧାନ ହେଲେ।
Verse 21
धर्मराजो5पि मेधावी श्रुत्वा व्यासस्य तद् वच: । वित्तस्यानयने तात चकार गमने मतिम्,तात! व्यासजीका वचन सुनकर बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरने धन लानेके लिये हिमालयकी यात्रा करनेका विचार किया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାତ! ବ୍ୟାସଙ୍କ ସେହି ବଚନ ଶୁଣି ମେଧାବୀ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଧନ ଆଣିବା ପାଇଁ ଯାତ୍ରା କରିବାକୁ ନିଶ୍ଚୟ କଲେ।
Verse 61
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वरें वसुदेवकोी सान्त्वनाविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଆଶ୍ୱମେଧିକପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଅନୁଗୀତାପର୍ବରେ ବସୁଦେବ-ସାନ୍ତ୍ୱନାବିଷୟକ ଏକଷଷ୍ଟିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 62
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि वासुदेवसान्त्वने द्विषष्टितमो5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपरववके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें श्रीकृष्णकी सान्त्वनाविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଅଶ୍ୱମେଧିକ ପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଅନୁଗୀତା ପର୍ବରେ ବାସୁଦେବଙ୍କ ସାନ୍ତ୍ୱନାମୟ ଉପଦେଶ-ବିଷୟକ ବାଷଠିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 76
नोपागच्छन्त वै शान्तिमभिमन्युविनाकृता: । वे सबके सब अत्यन्त दुःखसे संतप्त थे। उन्हें शान्ति नहीं मिलती थी। उसी प्रकार हस्तिनापुरमें वीर पाण्डव भी अभिमन्युसे रहित होकर शान्ति नहीं पाते थे
ଅଭିମନ୍ୟୁ ବିନା ସେମାନେ ନିଶ୍ଚୟ ଶାନ୍ତିକୁ ପ୍ରାପ୍ତ କରିପାରିଲେ ନାହିଁ। ସମସ୍ତେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁଃଖରେ ଦଗ୍ଧ ଥିଲେ; ତାଙ୍କୁ ଶାନ୍ତି ମିଳୁନଥିଲା। ସେହିପରି ହସ୍ତିନାପୁରରେ ମଧ୍ୟ ବୀର ପାଣ୍ଡବମାନେ ଅଭିମନ୍ୟୁ ବିହୀନ ହୋଇ ଶାନ୍ତି ପାଇଲେ ନାହିଁ।
How to secure material resources for a public rite without appearing predatory: the chapter resolves this by grounding action in elder counsel, collective deliberation, and ritual legitimacy rather than unilateral extraction.
Strategic action is strengthened by humility and sanctioned worship: Bhīma proposes that reverence to Maheśvara aligns human initiative with a higher order, reducing conflict with formidable guardians through earned favor rather than brute force.
No explicit phalaśruti is stated in these verses; the chapter’s meta-sense is procedural—showing that auspicious timing, blessings, and respectful leave-taking function as embedded validations of dharmic conduct.