धृतराष्ट्रदर्शनाय पाण्डवानां प्रयाणम् | The Pāṇḍavas Prepare to Visit Dhṛtarāṣṭra
एक समयकी बात है, परम क्रोधी तपस्वी ब्राह्मण दुर्वासा मेरे पिताके यहाँ भिक्षाके लिये आये थे। मैंने उन्हें अपने द्वारा की गयी सेवाओंसे संतुष्ट कर लिया ।। शौचेन त्वागसस्त्यागै: शुद्धेन मनसा तथा । कोपस्थानेष्वपि महत्स्त्वकुप्यन्न कदाचन,मैं शौचाचारका पालन करती, अपराधसे बची रहती और शुद्ध हृदयसे उनकी आराधना करती थी। क्रोधके बड़े-से-बड़े कारण उपस्थित होनेपर भी मैंने कभी उनपर क्रोध नहीं किया
vaiśampāyana uvāca | ekaṃ samayaṃ paramakrodhī tapasvī brāhmaṇo durvāsā mama pituḥ gṛhe bhikṣārthaṃ samāgataḥ | mayā svasevayā sa tuṣṭaḥ kṛtaḥ || śaucena tv āgasas tyāgaiḥ śuddhena manasā tathā | kopasthāneṣv api mahatsv akupyan na kadācana ||
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଏକ ସମୟରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ କ୍ରୋଧୀ ତପସ୍ବୀ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଦୁର୍ବାସା ମୋ ପିତାଙ୍କ ଘରକୁ ଭିକ୍ଷା ପାଇଁ ଆସିଥିଲେ। ମୋ ସେବାରେ ମୁଁ ତାଙ୍କୁ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ କରିଦେଲି। ଶୌଚାଚାର, ଅପରାଧ-ତ୍ୟାଗ ଓ ଶୁଦ୍ଧ ମନରେ ମୁଁ ତାଙ୍କୁ ଆରାଧନା କରୁଥିଲି; କ୍ରୋଧର ବଡ଼ କାରଣ ଥିଲେ ମଧ୍ୟ ମୁଁ କେବେ ତାଙ୍କ ଉପରେ କ୍ରୋଧ କରିନଥିଲି।
वैशम्पायन उवाच