
Adhyāya 11 — Maṇḍala-vicāra and Ṣāḍguṇya-prayoga (Circle-of-Kings Analysis and the Six Policies)
Upa-parva: Nīti-upadeśa (Rājanīti on Maṇḍala and Ṣāḍguṇya) — Dhṛtarāṣṭra’s Counsel to Yudhiṣṭhira
Dhṛtarāṣṭra instructs Yudhiṣṭhira to ‘know the circles’ (maṇḍalāni) of self and others, including neutral and intermediate parties, and to classify relationships among hostile powers, allies, and allied-allies. He enumerates state factors—ministers, territories, forts (including difficult terrain), and forces—treating them as variables that shift with circumstance. The discourse then anchors decision-making in ṣāḍguṇya (six strategic measures), alongside the assessment of growth/decline and the appropriate ‘station’ (sthāna). Dhṛtarāṣṭra advises engagement when one’s side is strong and the opponent weak, and agreement when one is weak; he emphasizes treasury accumulation as preparation for movement (yāna). He warns against dividing one’s position inappropriately, prescribes offering low-yield land in adverse circumstances, and counsels prudence in accepting wealth or alliances from reversed/hostile configurations. He discusses seeking hostages or royal sons for treaty security while also urging efforts to secure release through skilled counsel. The chapter ends with practical measures for safeguarding one’s realm—pressure, immobilization, treasury disruption—while cautioning against harming a subordinate who has submitted, and it outlines graded withdrawal with ministers, treasury, civic support, and force when resistance is not feasible.
Chapter Arc: वनवास-आश्रम के कठोर कष्टों से तपे भीम के भीतर पुरानी कटुता फिर जाग उठती है—धृतराष्ट्र के प्रति उसका रोष युधिष्ठिर के दान-निर्णय पर छाया डालने लगता है। → अर्जुन भीम को समझाता है कि साधुजन अपराध नहीं, उपकार स्मरण रखते हैं और आर्य-मर्यादा का पालन ही श्रेष्ठता है; युधिष्ठिर इस उपदेश को सुनकर विदुर को दूत बनाकर धृतराष्ट्र तक अपना निश्चय पहुँचाने का संकल्प करता है, पर भीम के क्रोध की आशंका बनी रहती है। → युधिष्ठिर विदुर से कहलवाता है कि धृतराष्ट्र पुत्रों और सुहृदों के श्राद्ध हेतु जितना चाहें उतना व्यय करें—मेरे और अर्जुन के गृह का समस्त धन उन्हीं का है; यहाँ तक कि ‘मेरा शरीर भी आपके अधीन है’—यह पूर्ण समर्पण अध्याय का शिखर बनता है। → युधिष्ठिर स्पष्ट करता है कि धृतराष्ट्र को भीमसेन के कोप का भय नहीं करना चाहिए; भीम स्वयं वन के हिम-वर्षा-धूप और अनेक दुःखों से परिक्लिष्ट होकर अब संयम के योग्य है—इस प्रकार दान, क्षमा और कुल-शांति का मार्ग प्रशस्त होता है। → विदुर यह संदेश लेकर धृतराष्ट्र के पास जाता है—अब प्रश्न यह है कि वृद्ध राजा इस उदार स्वीकृति को कैसे ग्रहण करेगा और भीम का अंतःसंघर्ष वास्तव में शांत होगा या नहीं।
Verse 1
द्वादशोड् ध्याय: अर्जुनका भीमको समझाना और युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रको यथेष्ट धन देनेकी स्वीकृति प्रदान करना अजुन उवाच भीम ज्येष्ठो गुरुमें त्वं नातो<न्यद् वक्तुमुत्सहे । धृतराष्ट्रस्तु राजर्षि: सर्वथा मानमहति
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—ଭୀମ, ତୁମେ ମୋର ଜ୍ୟେଷ୍ଠ ଭ୍ରାତା ଓ ଗୁରୁସମ; ତେଣୁ ତୁମ ସମ୍ମୁଖରେ ଏହା ଛଡ଼ା ଆଉ କିଛି କହିବାକୁ ମୁଁ ସାହସ କରେନି—ରାଜର୍ଷି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ସର୍ବଥା ସମ୍ମାନର ଯୋଗ୍ୟ।
Verse 2
न स्मरन्त्यपराद्धानि स्मरन्ति सुकृतान्यपि । असम्धिन्नार्यमर्यादा: साधव: पुरुषोत्तमा:
ଯେମାନେ ଆର୍ୟମର୍ଯ୍ୟାଦା ଭଙ୍ଗ କରିନାହାନ୍ତି, ସେହି ସାଧୁସ୍ୱଭାବୀ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପୁରୁଷମାନେ ଅନ୍ୟର ଅପରାଧ ସ୍ମରଣ କରନ୍ତି ନାହିଁ; ଉପକାରକୁ ହିଁ ସ୍ମରଣ କରନ୍ତି, ସୁକୃତକୁ ମଧ୍ୟ ଭୁଲନ୍ତି ନାହିଁ।
Verse 3
इति तस्य वच: श्रुत्वा फाल्गुनस्य महात्मन: । विदुरं प्राह धर्मात्मा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर:,महात्मा अर्जुनकी यह बात सुनकर धर्मात्मा कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने विदुरजीसे कहा --
ମହାତ୍ମା ଫାଲ୍ଗୁନ (ଅର୍ଜୁନ)ଙ୍କ ଏହି ବଚନ ଶୁଣି ଧର୍ମାତ୍ମା କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ବିଦୁରଙ୍କୁ କହିଲେ—
Verse 4
इदं मद्वचनात् क्षत्त: कौरवं ब्रूहि पार्थिवम् । यावदिच्छति पुत्राणां श्राद्ध तावद् ददाम्यहम्
“ହେ କ୍ଷତ୍ତା! ମୋର ବଚନରେ କୌରବ ନୃପଙ୍କୁ ଯାଇ କହ—ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ଶ୍ରାଦ୍ଧ ପାଇଁ ସେ ଯେତେ ଧନ ଇଚ୍ଛା କରନ୍ତି, ସେତେ ମୁଁ ଦେବି।”
Verse 5
भीष्मादीनां च सर्वेषां सुहृदामुपकारिणाम् | मम कोशादिति विभो मा भूद् भीम: सुदुर्मना:
“ପ୍ରଭୋ! ଭୀଷ୍ମ ଆଦି ସମସ୍ତ ଉପକାରୀ ସୁହୃଦମାନଙ୍କ ଶ୍ରାଦ୍ଧ ପାଇଁ ଧନ ମୋର କୋଷରୁ ହିଁ ଯାଉ; ଏଥିପାଇଁ ଭୀମସେନ ମନରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁଃଖୀ ନ ହେଉନ୍ତୁ।”
Verse 6
वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा धर्मराजस्तमर्जुनं प्रत्यपूजयत् । भीमसेन: कटाक्षेण वीक्षां चक्रे धनंजयम्
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ଏହିପରି କହି ଧର୍ମରାଜ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ସମ୍ମାନ କଲେ। ସେହି ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ ଭୀମସେନ ଧନଞ୍ଜୟଙ୍କୁ କଟାକ୍ଷରେ ଦେଖିଲେ।
Verse 7
ततः स विदुरं धीमान् वाक्यमाह युधिष्ठिर: । भीमसेने न कोप॑ं स नृपति: कर्तुमहति,तब बुद्धिमान् युधिष्ठिरने विदुरसे कहा--“चाचाजी! राजा धृतराष्ट्रको भीमसेनपर क्रोध नहीं करना चाहिये
ତେବେ ବୁଦ୍ଧିମାନ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ବିଦୁରଙ୍କୁ କହିଲେ—“କାକାଜୀ! ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଭୀମସେନଙ୍କ ଉପରେ କ୍ରୋଧ କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।”
Verse 8
परिक्लिष्टो हि भीमो5पि हिमवृष्टयातपादिभि: । दुःखैर्बहुविधैर्धीमानरण्ये विदितं तव,“आपको तो मालूम ही है कि वनमें हिम, वर्षा और धूप आदि नाना प्रकारके दुःखोंसे बुद्धिमान् भीमसेनको बड़ा कष्ट उठाना पड़ा है
ତୁମେ ତ ଜାଣିଛ—ଅରଣ୍ୟରେ ହିମ, ବର୍ଷା, ତୀବ୍ର ଧୂପ ଇତ୍ୟାଦି ନାନା ପ୍ରକାର ଦୁଃଖରେ ବୁଦ୍ଧିମାନ ଭୀମସେନ ମଧ୍ୟ ଅତ୍ୟନ୍ତ କ୍ଲେଶ ପାଇଥିଲେ।
Verse 9
कि तु मद्गबचनाद् ब्रूहि राजानं भरतर्षभ । यद् यदिच्छसि यावच्च गृहतां मद्गृूहादिति
କିନ୍ତୁ ମୋର କଥାରେ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ କୁହ, ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ—ଆପଣ ଯାହା-ଯାହା ଯେତେ ପରିମାଣରେ ନେବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରନ୍ତି, ସେସବୁ ମୋ ଘରୁ ଗ୍ରହଣ କରନ୍ତୁ।
Verse 10
यन्मात्सर्यमयं भीम: करोति भृशदुःखित: । न तन्मनसि कर्तव्यमिति वाच्य: स पार्थिव:
ଭୀମସେନ ଅତ୍ୟଧିକ ଦୁଃଖରେ କେବେ କେବେ ଯେ ଈର୍ଷ୍ୟା ପ୍ରକାଶ କରନ୍ତି—ମହାରାଜ ତାହାକୁ ମନରେ ଧରିବେ ନାହିଁ; ଏହି କଥା ତାଙ୍କୁ କୁହାଯାଉ।
Verse 11
यन्ममास्ति धनं किंचिदर्जुनस्य च वेश्मनि । तस्य स्वामी महाराज इति वाच्य: स पार्थिव:,“मेरे और अर्जुनके घरमें जो कुछ भी धन है, उस सबके स्वामी महाराज धूृतराष्ट्र हैं; यह बात उन्हें बता दीजिये
ମୋ ଘରେ ଓ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ଗୃହରେ ଯେ କିଛି ଧନ ଅଛି—ସେ ସବୁର ସ୍ୱାମୀ ମହାରାଜ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର; ଏହି କଥା ତାଙ୍କୁ କୁହ।
Verse 12
ददातु राजा वित्रेभ्यो यथेष्ट क्रियतां व्यय: । पुत्राणां सुहृदां चैव गच्छत्वानृण्यमद्य सः
ରାଜା ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ଯଥେଷ୍ଟ ଦାନ ଦିଅନ୍ତୁ; ଯେପରି ଇଚ୍ଛା ସେପରି ବ୍ୟୟ ହେଉ। ଆଜି ସେ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ଓ ସୁହୃଦମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଥିବା ସମସ୍ତ ଋଣରୁ ମୁକ୍ତ ହେଉନ୍ତୁ।
Verse 13
इदं चापि शरीरं मे तवायत्तं जनाधिप । धनानि चेति विद्धि त्वं न मे तत्रास्ति संशय:
ହେ ଜନାଧିପ! ମୋର ଏହି ଶରୀର ମଧ୍ୟ ଆପଣଙ୍କ ଅଧୀନ, ଏବଂ ମୋର ଧନସମ୍ପତ୍ତି ମଧ୍ୟ—ଏହା ଆପଣ ନିଶ୍ଚୟ ଜାଣନ୍ତୁ। ଏଥିରେ ମୋ ମନରେ କୌଣସି ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।
The tension between strategic necessity and ethical restraint: the chapter permits calibrated non-kinetic measures to protect the realm while explicitly discouraging harm to a subordinate who has submitted, aligning expediency with governance norms.
Policy must be conditional and evidence-based: evaluate the maṇḍala, classify relationships, measure strength and resources, and then select the appropriate ṣāḍguṇya response (e.g., engagement, agreement, movement) rather than acting from anger or pride.
No explicit phalaśruti appears in the provided passage; the chapter functions as technical instruction, embedding its ‘value’ in practical governance outcomes and in the broader epic aim of aligning rule with dharma.
Read Mahabharata in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.