
Adhyāya 39 — Yudhiṣṭhira’s inquiry on attachment (saṅga) and relational restraint
Upa-parva: Strī-dharma / Saṅga-vicāra (Women, attachment, and ethical restraint) — didactic dialogue unit within Anuśāsana-parva
This chapter is composed as Yudhiṣṭhira’s interrogative address to a senior authority figure (Kuru elder), asking why humans repeatedly become attached to women and why women likewise become attached to men, describing this as a publicly observable fact (lokasākṣikam). He frames a persistent internal doubt regarding the mechanisms of attraction—whether affection arises, fades, or shifts—and asks how such relationships can be ethically “protected” or regulated. The verses employ rhetorical generalizations about persuasion and emotional mirroring (laughing with the laughing, weeping with the weeping), and reference mythic exemplars of māyā (Śambara, Namuci, Bali, Kumbhīnasa) as analogies for deceptive or shifting appearances. The chapter’s function is preparatory: it articulates the problem-statement for Bhīṣma’s forthcoming normative explanation, centering on self-mastery, discernment, and the social risks of unexamined attachment.
Chapter Arc: दान-धर्म के उपदेश में भीष्म एक विलक्षण आख्यान उठाते हैं—देवराज इन्द्र स्वयं अज्ञातरूप धारण कर दानव-राज शम्बर से पूछते हैं कि वह किस आचरण से अपनी जाति में श्रेष्ठ माना जाता है। → इन्द्र का प्रश्न शम्बर की प्रतिष्ठा की जड़ पर चोट करता है: ‘किस वृत्त से तू स्वजाति में अधिष्ठित है?’ शम्बर उत्तर में बाहुबल नहीं, बल्कि ब्राह्मणों के प्रति विनय, श्रवण, सेवा, और उनके वचनों को ग्रहण करने की साधना का विधान रखता है—और यह उलटबाँसी (दानव का ब्राह्मण-भक्त होना) कथा को तीखा बनाती है। → शम्बर अपने आचरण का सार उद्घाटित करता है: वह विद्वानों के वचनों का अपमान नहीं करता, उनके चरण पकड़ता है, संतुष्ट ब्राह्मण जो कहते हैं उसे मेधा से ग्रहण कर आत्म-समाधि को अनुकूल दिशा में स्थिर करता है; ब्रह्मचर्य, प्रणव-अध्ययन, क्लेश-सहन, निर्मन्यता और समदर्शन जैसे गुणों को ब्राह्मण-सेवा का फल बताता है—यही ‘श्रेष्ठता’ का रहस्य है। → इन्द्र शम्बर के मुख से ब्राह्मण-प्रशंसा और आचार-धर्म का मर्म सुनकर उसे सत्य मानते हैं; स्वयं द्विजों का पूजन करते हैं और महेन्द्रत्व (ऐश्वर्य/श्रेष्ठता) की सिद्धि का कारण ब्राह्मण-सम्मान को ठहराते हैं।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके दो श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं) अपर < बक। है २ >> षट्त्रिशो5ध्याय: ब्राह्मणकी प्रशंसाके विषयमें इन्द्र और शम्बरासुरका संवाद भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । शक्रशम्बरसंवादं तन्निबोध युधिष्ठिर,भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! इस विषयमें इन्द्र और शम्बरासुरके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, इसे सुनो
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ଏହି ବିଷୟରେ ମଧ୍ୟ ଗୋଟିଏ ପୁରାତନ ଇତିହାସର ଉଦାହରଣ ଦିଆଯାଏ। ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର) ଓ ଶମ୍ବରାସୁରଙ୍କ ସଂବାଦ ଶୁଣ।
Verse 2
शक्रो हाज्ञातरूपेण जटी भूत्वा रजोगुण: । विरूपं रथमास्थाय प्रश्न॑ पप्रच्छ शम्बरम्,एक समयकी बात है, देवराज इन्द्र अज्ञातरूपसे रजोगुणसम्पन्न जटाधारी तपस्वी बनकर एक बेडौल रथपर सवार हो शम्बरासुरके पास गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने उससे पूछा
ଏକ ସମୟରେ ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର) ଅଜ୍ଞାତ ରୂପ ଧାରଣ କରି, ରଜୋଗୁଣଯୁକ୍ତ ଜଟାଧାରୀ ତପସ୍ବୀ ହୋଇ, ଏକ ବିକୃତ ରଥରେ ଆରୋହଣ କରି ଶମ୍ବରଙ୍କ ନିକଟକୁ ଗଲେ ଏବଂ ତାଙ୍କୁ ଗୋଟିଏ ପ୍ରଶ୍ନ କଲେ।
Verse 3
शक्र उवाच केन शम्बर वृत्तेन स्वजात्यानधितिष्ठसि । श्रेष्ठ त्वां केन मन्यन्ते तद् वै प्रब्रूहि तत्त्वतः,इन्द्र बोले--शम्बरासुर! किस बर्तावसे अपनी जातिवालोंपर शासन करते हो? वे किस कारण तुम्हें सर्वश्रेष्ठ मानते हैं? यह ठीक-ठीक बतलाओ
ଶକ୍ର କହିଲେ—ହେ ଶମ୍ବର! କେଉଁ ଆଚରଣଦ୍ୱାରା ତୁମେ ନିଜ ଜାତିୟମାନଙ୍କ ଉପରେ ଶାସନ କରୁଛ? କେଉଁ କାରଣରୁ ସେମାନେ ତୁମକୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ମାନନ୍ତି? ତାହା ସତ୍ୟତଃ କହ।
Verse 4
शम्बर उवाच नासूयामि यदा वित्रान् ब्राह्ममेव च मे मतम् । शास्त्राणि वदतो विप्रान् सम्मन्यामि यथासुखम्,शम्बरासुरने कहा--मैं ब्राह्मणोंमें कभी दोष नहीं देखता। उनके मतको ही अपना मत समझता हूँ और शास्त्रोंकी बात बतानेवाले विप्रोंका सदा सम्मान करता हूँ--उन्हें यथासाध्य सुख देनेकी चेष्टा करता हूँ
ଶମ୍ବର କହିଲେ—ମୁଁ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ପ୍ରତି କେବେ ଦୋଷଦର୍ଶନ କରେନି, ନ ଅସୂୟା କରେ। ଯାହା ବ୍ରାହ୍ମ—ଶାସ୍ତ୍ରସମ୍ମତ ଓ ସଦାଚାର—ସେହି ମୋର ମତ। ଶାସ୍ତ୍ର କହୁଥିବା ବିପ୍ରମାନଙ୍କୁ ମୁଁ ସମ୍ମାନ କରେ ଏବଂ ଯଥାଶକ୍ତି ସେମାନଙ୍କ ସୁଖ-ସହାୟତା କରେ।
Verse 5
श्रुत्वा च नावजानामि नापराध्यामि कर्हिचित् । अभ्यर्च्यभ्यनुपृच्छामि पादौ गृह्नामि धीमताम्,सुनकर उनके वचनोंकी अवहेलना नहीं करता। कभी उनका अपराध नहीं करता। उनकी पूजा करके कुशल पूछता हूँ और बुद्धिमान ब्राह्मणोंके पाँव पकड़ता हूँ
ତାଙ୍କ କଥା ଶୁଣି ମୁଁ ତାଙ୍କୁ ଅବମାନ କରେନି, କେବେ ତାଙ୍କ ପ୍ରତି ଅପରାଧ ମଧ୍ୟ କରେନି। ପୂଜା କରି କୁଶଳ-କ୍ଷେମ ପଚାରେ ଏବଂ ବୁଦ୍ଧିମାନ—ବିଶେଷତଃ ବିବେକୀ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ—ଚରଣ ଧରି ପ୍ରଣାମ କରେ।
Verse 6
ते विश्रब्धा: प्रभाषन्ते सम्पृच्छन्ते च मां सदा । प्रमत्तेष्वप्रमत्तो5स्मि सदा सुप्तेषु जागृमि,ब्राह्मण भी अत्यन्त विश्वस्त होकर मेरे साथ बातचीत करते और मेरी कुशल पूछते हैं। ब्राह्मणोंके असावधान रहनेपर भी मैं सदा सावधान रहता हूँ। उनके सोते रहनेपर भी मैं जागता रहता हूँ
ସେହି ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ନିର୍ଭୟ ଓ ନିଶ୍ଚିନ୍ତ ହୋଇ ମୋ ସହ ମୁକ୍ତଭାବେ କଥା କହନ୍ତି ଏବଂ ସଦା ମୋ କୁଶଳ ପଚାରନ୍ତି। ସେମାନେ ଅସାବଧାନ ଥିଲେ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ସଦା ସାବଧାନ; ସେମାନେ ଶୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ଜାଗ୍ରତ ରହେ।
Verse 7
ते मां शास्त्रपथे युक्त ब्रह्मण्पमनसूयकम् । समासिज्चन्ति शास्तार: क्षौद्रं मथ्विव मक्षिका:,मुझे शास्त्रीय मार्गपर चलनेवाला ब्राह्मणभक्त तथा अदोषदर्शी जानकर वे उपदेशक ब्राह्मण मुझे उसी प्रकार सदुपदेशके अमृतसे सींचते रहते हैं जैसे मधुमक्खियाँ मधुके छत्तेको
ମୋତେ ଶାସ୍ତ୍ରପଥରେ ନିୟୁକ୍ତ, ବ୍ରାହ୍ମଣଭକ୍ତ ଓ ଦୋଷ ନ ଦେଖୁଥିବା ବୋଲି ଜାଣି, ସେହି ଉପଦେଶକ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ମଧୁମକ୍ଷୀମାନେ ମଧୁଛତାକୁ ମଧୁରେ ପୂରଣ କରିବା ପରି, ସଦୁପଦେଶ-ରୂପ ଅମୃତରେ ମୋତେ ନିରନ୍ତର ସିଞ୍ଚନ୍ତି।
Verse 8
यच्च भाषन्ति संतुष्टास्तच्च गृह्नामि मेधया । समाधिमात्मनो नित्यमनुलोममचिन्तयम्,संतुष्ट होकर वे मुझसे जो कुछ कहते हैं उसे मैं अपनी बुद्धिके द्वारा ग्रहण करता हूँ। सदा ब्राह्मणोंमें अपनी निष्ठा बनाये रखता हूँ और नित्यप्रति उनके अनुकूल विचार रखता हूँ
ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ହୋଇ ସେମାନେ ଯାହା କହନ୍ତି, ମୁଁ ତାହାକୁ ମୋ ମେଧାଦ୍ୱାରା ଗ୍ରହଣ କରେ। ମୁଁ ନିତ୍ୟ ମୋ ମନକୁ ସମାଧିରେ ସ୍ଥିର ରଖେ ଏବଂ ପ୍ରତିଦିନ ସେମାନଙ୍କ ଅନୁକୂଳ ଭାବେ ଚିନ୍ତା କରେ।
Verse 9
सोऊहं वागग्रमृष्टानां रसानामवलेहक: । स्वजात्यानधितिष्ठामि नक्षत्राणीव चन्द्रमा:,उनकी वाणीसे जो उपदेशका मधुर रस प्रवाहित होता है उसका मैं आस्वादन करता रहता हूँ। इसीलिये नक्षत्रोंपर चन्द्रमाकी भाँति मैं अपनी जातिवालोंपर शासन करता हूँ
ତାଙ୍କ ବାଣୀରୁ ଉପଦେଶର ଯେ ମଧୁର ରସ ପ୍ରବାହିତ ହୁଏ, ମୁଁ ତାହାକୁ ନିରନ୍ତର ଆସ୍ୱାଦନ କରେ। ଏହିକାରଣରୁ, ନକ୍ଷତ୍ରମାନଙ୍କ ଉପରେ ଚନ୍ଦ୍ରମା ଯେପରି ଅଧିଷ୍ଠାନ କରେ, ସେପରି ମୁଁ ମୋ ସ୍ୱଜାତିୟମାନଙ୍କ ଉପରେ ଅଧିକାର ରଖି ଶାସନ କରେ।
Verse 10
एतत् पृथिव्याममृतमेतच्चक्षुरनुत्तमम् । यद् ब्राह्मणमुखात् शास्त्रमिह श्रुत्वा प्रवर्तते,ब्राह्मणके मुखसे शास्त्रका उपदेश सुनकर इस जीवनमें उसके अनुसार बर्ताव करना ही पृथ्वीपर सर्वोत्तम अमृत और सर्वोत्तम दृष्टि है
ପୃଥିବୀରେ ଏହିଏ ପରମ ଅମୃତ, ଏହିଏ ଅନୁତ୍ତମ ‘ଦୃଷ୍ଟି’—ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ମୁଖରୁ ଶାସ୍ତ୍ରୋପଦେଶ ଶୁଣି ଏହି ଜୀବନରେ ତଦନୁସାରେ ଆଚରଣ କରିବା।
Verse 11
एतत् कारणमाज्ञाय दृष्टवा देवासुरं पुरा । युद्ध पिता मे हृष्टात्मा विस्मित: समपद्यत
ଏହି କାରଣ ଜାଣି, ପୂର୍ବକାଳରେ ଦେବାସୁର ଯୁଦ୍ଧ ଦେଖି, ସେହି ଯୁଦ୍ଧମଧ୍ୟରେ ମୋ ପିତା ହୃଷ୍ଟଚିତ୍ତ ହୋଇ ବିସ୍ମୟାକୁଳ ହେଲେ।
Verse 12
इस कारणको जानकर अर्थात् ब्राह्मणके उपदेशके अनुसार चलना ही अमृत है--इस बातको भलीभाँति समझकर पूर्वकालमें देवासुरसंग्रामको उपस्थित हुआ देख मेरे पिता मन-ही-मन प्रसन्न और विस्मित हुए थे ।। दृष्टवा च ब्राह्म॒णानां तु महिमानं महात्मनाम् | पर्यपृच्छत् कथममी सिद्धा इति निशाकरम्,महात्मा ब्राह्मणोंकी इस महिमाको देखकर उन्होंने चन्द्रमासे पूछा--“निशाकर! इन ब्राह्मणोंको किस प्रकार सिद्धि प्राप्त हुई?”
ମହାତ୍ମା ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ଏହି ମହିମା ଦେଖି ମୋ ପିତା ମନେମନେ ପ୍ରସନ୍ନ ଓ ବିସ୍ମିତ ହେଲେ; ପରେ ସେ ନିଶାକର ଚନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ପଚାରିଲେ—“ଏହି ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ କିପରି ସିଦ୍ଧି ପାଇଲେ?”
Verse 13
सोम उवाच ब्राह्म॒णास्तपसा सर्वे सिध्यन्ते वाग्वला: सदा । भुजवीर्याश्व राजानो वागस्त्राश्न द्विजातय:,चन्द्रमाने कहा--दानवराज! सम्पूर्ण ब्राह्मण तपस्यासे ही सिद्ध हुए हैं। इनका बल सदा इनकी वाणीमें ही होता है। राजाओंका बल उनकी भुजाएँ हैं और ब्राह्मणोंका बल उनकी वाणी
ସୋମ କହିଲେ—“ସମସ୍ତ ବ୍ରାହ୍ମଣ ତପସ୍ୟାଦ୍ୱାରା ହିଁ ସିଦ୍ଧି ପାଆନ୍ତି; ତାଙ୍କର ବଳ ସଦା ବାଣୀରେ ରହେ। ରାଜାମାନଙ୍କ ବଳ ଭୁଜବୀର୍ୟ; ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କ ଅସ୍ତ୍ର ବାଣୀ ହିଁ।”
Verse 14
प्रणवं चाप्यधीयीत ब्राद्मीर्दुर्वसतीर्वसन् । निर्मन्युरपि निर्वाणो यदि स्यात् समदर्शन:,पहले गुरुके घरमें ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए क्लेश-सहनपूर्वक निवास करके प्रणवसहित वेदका अध्ययन करना चाहिये। फिर अन्तमें क्रोध त्यागकर शान्तभावसे संन्यास ग्रहण करना चाहिये। यदि संन्यासी हो तो सर्वत्र समान दृष्टि रखे
ଗୁରୁଗୃହରେ ବ୍ରହ୍ମଚର୍ଯ୍ୟ ପାଳନ କରି, କଷ୍ଟ ସହି ବାସ କରି, ପ୍ରଣବ ସହିତ ବେଦ ଅଧ୍ୟୟନ କରିବା ଉଚିତ। ଶେଷରେ କ୍ରୋଧ ତ୍ୟାଗ କରି ଶାନ୍ତଭାବେ ସନ୍ନ୍ୟାସ ଗ୍ରହଣ କରିବା ଉଚିତ; ଏବଂ ସନ୍ନ୍ୟାସୀ ହେଲେ ସର୍ବତ୍ର ସମଦୃଷ୍ଟି ରଖିବା ଉଚିତ।
Verse 15
अपि च ज्ञानसम्पन्न: सर्वान् वेदान् पितुर्गृहि । श्लाघमान इवाधीयादू ग्राम्य इत्येव त॑ विदु:,जो सम्पूर्ण वेदोंको पिताके घरमें रहकर पढ़ता है वह ज्ञानसम्पन्न और प्रशंसनीय होनेपर भी दिद्वानोंके द्वारा ग्रामीण (गँवार) ही समझा जाता है। (वास्तवमें गुरुके घरमें क्लेश-सहनपूर्वक रहकर वेद पढ़नेवाला ही श्रेष्ठ है)
Moreover, even if a man is endowed with knowledge and studies all the Vedas while remaining in his father’s house—appearing as though he were worthy of praise—learned people still regard him as merely ‘rustic’. The ethical point implied is that true excellence in Vedic learning is associated with disciplined studentship under a teacher, enduring hardship in the guru’s household, rather than comfortable study at home.
Verse 16
भूमिरेतो निगिरति सर्पो बिलशयानिव । राजानं चाप्ययोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम्,जैसे साँप बिलमें रहनेवाले छोटे जीवोंको निगल जाता है, उसी प्रकार युद्ध न करनेवाले क्षत्रिय और विद्याके लिये प्रवास न करनेवाले ब्राह्मणको यह पृथ्वी निगल जाती है
Soma said: “As a serpent swallows up small creatures that dwell in holes, so does the earth ‘swallow’ (i.e., bring to ruin and obscurity) a king who will not fight and a Brahmin who will not go forth in pursuit of learning. In other words, neglect of one’s proper duty—valor and protection for the Kshatriya, disciplined study through travel and training for the Brahmin—leads to decline, as surely as prey is consumed by a snake.”
Verse 17
अभिमान: श्रियं हन्ति पुरुषस्याल्पमेधस: । गर्भेण दुष्यते कन्या गृहवासेन च द्विज:,मन्दबुद्धि पुरुषके भीतर जो अभिमान होता है वह उसकी लक्ष्मीका नाश करता है। गर्भ धारण करनेसे कन्या दूषित हो जाती है और सदा घरमें रहनेसे ब्राह्मण दूषित समझे जाते हैं
Soma said: “Pride destroys the prosperity of a man of little understanding. A maiden is considered tainted by pregnancy, and a Brahmin is deemed tainted by constant residence at home.” The verse warns that inner arrogance erodes one’s fortune and reputation, and it uses socially recognized examples of ‘defilement’ to stress the need for restraint, vigilance, and disciplined conduct.
Verse 18
(विद्याविदो लोकविद: तपोबलसमन्विता: । नित्यपूज्याश्र वन्द्याश्न द्विजा लोकद्वयेच्छुभि: ।।) जो इहलोक और परलोक दोनोंको सुधारना चाहते हों, उन्हें विद्वान, लौकिक बातोंके ज्ञाता, तपस्वी और शक्तिशाली ब्राह्मणोंकी सदा पूजा और वन्दना करनी चाहिये ।। इत्येतन्मे पिता श्रुत्वा सोमादद्भुतदर्शनात् । ब्राह्मणान् पूजयामास तथैवाहं महाव्रतान्,अदभुत दर्शनवाले चन्द्रमासे यह बात सुनकर मेरे पिताजीने महान् व्रतधारी ब्राह्मणोंका पूजन किया। वैसे ही मैं भी करता हूँ
Soma said: “Those who seek the welfare of both this world and the next should always honor and bow to Brahmins who are learned in sacred knowledge, skilled in worldly understanding, and endowed with ascetic power and strength. Having heard this teaching from Soma—of wondrous appearance—my father worshipped such great-vowed Brahmins; and I too do the same.”
Verse 19
भीष्म उवाच श्रुत्वैतद् वचन शक्रो दानवेन्द्रमुखाच्च्युतम् । द्विजान् सम्पूजयामास महेन्द्रत्वमवाप च,भीष्मजी कहते हैं--भारत! दानवराज शम्बरके मुखसे यह वचन सुनकर इन्द्रने ब्राह्मणोंका पूजन किया, इससे उन्हें महेन्द्रपदकी प्राप्ति हुई
Bhishma said: O Bharata, having heard these words that issued from the mouth of the lord of the Dānavas (Śambara), Śakra (Indra) honored the Brahmins; and by that act he attained the status of Mahendra. The passage underscores that reverence to the learned and righteous is a direct cause of exalted sovereignty and divine prosperity.
Verse 36
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ब्राह्मणप्रशंसायामिन्द्रशम्बरसंवादे षट्त्रिंशो5ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଅନୁଶାସନପର୍ବର ଦାନଧର୍ମପର୍ବରେ, ବ୍ରାହ୍ମଣ-ପ୍ରଶଂସା ପ୍ରସଙ୍ଗରେ, ଇନ୍ଦ୍ର ଓ ଶମ୍ବରଙ୍କ ସଂବାଦରେ ଛତ୍ତିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
The dilemma concerns how a person should maintain ethical judgment and social responsibility when attraction and attachment can distort perception, generate instability, and challenge ideals of restraint and trust.
The implied takeaway is that relational ethics must be approached through self-governance—examining desire, recognizing persuasive dynamics, and seeking principled guidance rather than assuming simple external control of outcomes.
No explicit phalaśruti appears in this adhyāya; its meta-function is diagnostic, formulating the inquiry that motivates subsequent instruction within Anuśāsana-parva’s broader didactic sequence.