Adhyaya 104
Anushasana ParvaAdhyaya 10436 Verses

Adhyaya 104

ब्रह्मस्वहरण-निषेधः — Prohibition of Appropriating Brahmin Property (Brahmasva)

Upa-parva: Dāna-Dharma & Brahmasva-Rakṣaṇa (Instruction on Gifts and Protection of Brahmin Property)

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma where those who forcibly take brāhmaṇa property go after death. Bhīṣma cites an ancient exemplum: a rājanya confronts an aged caṇḍāla whose behavior appears anomalous and questions his fear of cattle and his handling of water affected by cow-dust. The caṇḍāla explains a karmic history: a king and ritual participants benefited from brahmasva and suffered descent into hell; even those who consumed associated dairy products are described as incurring grave consequences. He draws a further caution against the commodification of soma, stating that buying and selling soma leads to punitive afterlife states (including Raurava), and he describes moral degradation tied to arrogance and harmful conduct. The caṇḍāla, possessing memory of prior births, seeks a definitive means of release from his condition; the rājanya prescribes self-sacrifice in a battlefield context ‘for the sake of brahmasva.’ Bhīṣma concludes by advising Yudhiṣṭhira to protect brahmasva if he seeks an enduring, elevated destiny.

Chapter Arc: युधिष्ठिर का प्रश्न धर्मसभा में गूंजता है—जो क्रूर और मंदबुद्धि मनुष्य ब्राह्मणों के धन का अपहरण करते हैं, वे किस लोक में गिरते हैं? यह प्रश्न केवल दंड का नहीं, समाज-धर्म की जड़ का है। → भीष्म उपाख्यान के रूप में क्षत्रिय और चाण्डाल का संवाद उठाते हैं। क्षत्रिय बूढ़े-से चाण्डाल को तिरस्कार से टोकता है—‘श्व-गर्दभों की धूल में रहने वाला तू गौओं की ओर क्यों दौड़ता है?’ चाण्डाल अपने जन्म को ‘पापयोनि’ कहकर स्वीकारता है, पर मुक्ति का मार्ग पूछकर कथा को आत्म-शुद्धि की ओर मोड़ देता है। फिर ब्राह्मण-धनहरण के नरक-फल, घोर यंत्रणाएँ, और पतन की परतें एक-एक कर खुलती जाती हैं; पाप का मानो लेखा-जोखा नहीं, एक भयावह भूगोल बनता है। → क्षत्रिय का कठोर आदेश-सा उपदेश—‘ब्राह्मणार्थे त्यजन् प्राणान्’—ब्राह्मण-स्व (ब्रह्मास्व) की रक्षा में प्राणोत्सर्ग ही ‘इष्ट गति’ का द्वार है। इसी के साथ नरकों का चरम वर्णन आता है: धर्म को तौलने-तोलने वाला अभिमानी, ब्राह्मण-धन का अपहर्ता, तीस नरकों में गिरकर अंततः अपनी ही विष्ठा पर जीने वाला कीट बनता है—यह पतन-चित्र अध्याय की सबसे तीखी चोट है। → अंत में भीष्म प्रायश्चित्त और शुद्धि के उपायों की ओर ले जाते हैं—स्वाध्याय, विविध दान, और गृहस्थ-धर्म के भीतर रहकर भी पाप-क्षालन की संभावना। साथ ही वैराग्य, आसक्ति-त्याग, और वेद-पाठ करने वाले ब्राह्मणों के प्रति अपराध की विशेष गंभीरता रेखांकित होती है—धर्म का मार्ग दंड से आगे, आत्म-संस्कार तक फैलता है। → ब्राह्मण-धन के अपराधी के लिए प्रायश्चित्त की सीमाएँ और ‘किस पाप का कौन-सा उपाय’—यह प्रश्न अगले प्रसंगों की ओर संकेत करता है।

Shlokas

Verse 1

/ एकाधिकशततमो< ध्याय: ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेसे प्राप्त होनेवाले दोषके विषयमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवाद तथा ब्रह्मास्वकी रक्षामें प्राणोत्सर्ग करनेसे चाण्डालको मोक्षकी प्राप्ति युधिछिर उवाच ब्राह्मणस्वानि ये मंदा हरन्ति भरतर्षभ । नृशंसकारिणो मूढा: क्व ते गच्छन्ति मानवा:

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଯେ ନୀଚ, ମୋହଗ୍ରସ୍ତ ଓ କ୍ରୂରକର୍ମୀ ମନୁଷ୍ୟ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ଧନ ହରଣ କରନ୍ତି, ସେମାନେ କେଉଁଠି ଯାଆନ୍ତି?

Verse 2

युधिष्ठिरने पूछा--भरतश्रेष्ठ! जो मूर्ख और मंदबुद्धि मानव क्रूरतापूर्ण कर्ममें संलग्न रहकर ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करते हैं, वे किस लोकमें जाते हैं? ।। भीष्य उवाच (पातकानां परं होतद्‌ ब्रह्मस्वहरणं बलात्‌ | सान्वयास्ते विनश्यन्ति चण्डाला: प्रेत्य चेह च ।।) भीष्मजीने कहा--राजन! ब्राह्मणोंके धनका बलपूर्वक अपहरण--यह सबसे बड़ा पातक है। ब्राह्मणोंका धन लूटनेवाले चाण्डाल-स्वभावयुक्त मनुष्य अपने कुल- परिवारसहित नष्ट हो जाते हैं ।। अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । चाण्डालस्य च संवाद क्षत्रबंधोश्व॒ भारत,भारत! इस विषयमें जानकार मनुष्य एक चाण्डाल और क्षत्रियबंधुका संवादविषयक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ— ରାଜନ! ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ଧନକୁ ବଳପୂର୍ବକ ହରଣ କରିବା ପାପମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସର୍ବୋଚ୍ଚ ପାପ। ଯେ ଚାଣ୍ଡାଳ-ସ୍ୱଭାବୀ ମନୁଷ୍ୟ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଧନ ଲୁଟନ୍ତି, ସେମାନେ ବଂଶ-ପରିବାର ସହିତ ଏହି ଲୋକରେ ମଧ୍ୟ ଓ ପରଲୋକରେ ମଧ୍ୟ ନଶ୍ଟ ହୁଅନ୍ତି। ଏହି ବିଷୟରେ ପଣ୍ଡିତମାନେ ଗୋଟିଏ ପୁରାତନ ଇତିହାସ ଉଦାହରଣ ଦିଅନ୍ତି—ହେ ଭାରତ! ଚାଣ୍ଡାଳ ଓ ‘କ୍ଷତ୍ରିୟ-ବନ୍ଧୁ’ଙ୍କ ସଂବାଦ।

Verse 3

राजन्य उवाच वृद्धरूपोडसि चाण्डाल बालवच्च विचेष्टसे । श्वखराणां रज:सेवी कस्मादुद्धिजसे गवाम्‌,क्षत्रियने पूछा--चाण्डाल! तू बूढ़ा हो गया है तो भी बालकों-जैसी चेष्टा करता है। कुत्तों और गधोंकी धूलिका सेवन करनेवाला होकर भी तू इन गौओंकी धूलिसे क्यों इतना उद्विग्न हो रहा है

କ୍ଷତ୍ରିୟ କହିଲା— ହେ ଚାଣ୍ଡାଳ! ତୁମେ ବୃଦ୍ଧ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ଶିଶୁ ପରି ଚେଷ୍ଟା କରୁଛ। କୁକୁର ଓ ଗଧାର ଧୂଳିରେ ଅଭ୍ୟସ୍ତ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ଗୋଧୂଳିରେ କାହିଁକି ଏତେ ଉଦ୍ବିଗ୍ନ ହେଉଛ?

Verse 4

साधुभिर्गहितं कर्म चाण्डालस्य विधीयते । कस्माद्‌ गोरजसा ध्वस्तमपां कुण्डे निषिउचसि,चाण्डालके लिये विहित कर्मकी श्रेष्ठ पुरुष निंदा करते हैं। तू गोधूलिसे ध्वस्त हुए अपने शरीरको क्यों जलके कुण्डमें डालकर धो रहा है?

କ୍ଷତ୍ରିୟ କହିଲା— ଚାଣ୍ଡାଳ ପାଇଁ ଯେ କର୍ମ ବିଧିତ, ସଜ୍ଜନମାନେ ତାହାକୁ ନିନ୍ଦା କରନ୍ତି। ତେବେ ଗୋଧୂଳିରେ ଢାକା ତୁମ ଦେହକୁ ତୁମେ କାହିଁକି ଜଳକୁଣ୍ଡରେ ଧୋଉଛ?

Verse 5

चाण्डाल उवाच ब्राह्मणस्य गवां राजन्‌ द्वियतीनां रज: पुरा । सोममुध्वंसयामास त॑ सोम॑ येडपिबन्‌ द्विजा:,चाण्डालने कहा--राजन्‌! पहलेकी बात है--एक ब्राह्मणकी कुछ गौओंका अपहरण किया गया था। जिस समय वे गौएँ हरकर ले जायी जा रही थीं, उस समय उनकी दुग्धकणमिश्रित चरणधूलिने सोमरसपर पड़कर उसे दूषित कर दिया। उस सोमरसको जिन ब्राह्मणोंने पीया, वे तथा उस यज्ञकी दीक्षा लेनेवाले राजा भी शीघ्र ही नरकमें जा गिरे। उन यज्ञ करानेवाले समस्त ब्राह्मणोंसहित राजा ब्राह्मणके अपहृत धनका उपयोग करके नरकगामी हुए

ଚାଣ୍ଡାଳ କହିଲା— ରାଜନ! ପୁରାତନ କାଳର କଥା—ଗୋଟିଏ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ କିଛି ଗାଈ ଅପହୃତ ହୋଇଥିଲା। ସେମାନଙ୍କୁ ହାଙ୍କି ନେଉଥିବା ବେଳେ ତାଙ୍କ ପାଦଧୂଳି—ଦୁଧକଣ ମିଶିତ—ସୋମରସ ଉପରେ ପଡ଼ି ତାହାକୁ ଦୂଷିତ କରିଦେଲା। ସେହି ସୋମକୁ ଯେ ଦ୍ୱିଜମାନେ ପିଇଥିଲେ ଓ ସେହି ଯଜ୍ଞ ପାଇଁ ଦୀକ୍ଷା ନେଇଥିବା ରାଜା—ସମସ୍ତେ ଶୀଘ୍ର ନରକରେ ପତିତ ହେଲେ। ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ଅପହୃତ ଧନରେ ଚାଲିଥିବା ଯଜ୍ଞ ଥିବାରୁ ରାଜା ଋତ୍ୱିଜମାନଙ୍କ ସହିତ ନରକଗାମୀ ହେଲେ।

Verse 6

दीक्षितश्न स राजापि क्षिप्रं नरकमाविशत्‌ | सह तैर्याजकै: सर्वर्त्रद्यस्वमुपजीव्य तत्‌,चाण्डालने कहा--राजन्‌! पहलेकी बात है--एक ब्राह्मणकी कुछ गौओंका अपहरण किया गया था। जिस समय वे गौएँ हरकर ले जायी जा रही थीं, उस समय उनकी दुग्धकणमिश्रित चरणधूलिने सोमरसपर पड़कर उसे दूषित कर दिया। उस सोमरसको जिन ब्राह्मणोंने पीया, वे तथा उस यज्ञकी दीक्षा लेनेवाले राजा भी शीघ्र ही नरकमें जा गिरे। उन यज्ञ करानेवाले समस्त ब्राह्मणोंसहित राजा ब्राह्मणके अपहृत धनका उपयोग करके नरकगामी हुए

ଚାଣ୍ଡାଳ କହିଲା—ରାଜନ! ଯଜ୍ଞଦୀକ୍ଷିତ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ସେଇ ରାଜା ଶୀଘ୍ର ନରକକୁ ପତିତ ହେଲା—ସମସ୍ତ ଯାଜକ ପୁରୋହିତମାନଙ୍କ ସହିତ—କାରଣ ସେମାନେ ଅପହୃତ ଧନକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ଜୀବନ ଯାପନ କରୁଥିଲେ, ସେଇ ସମ୍ପତ୍ତିକୁ ଉପଭୋଗ କରୁଥିଲେ। ଯଜ୍ଞରେ ଅଂଶଗ୍ରହଣ କଲେ ଚୋରା ଧନର କଳୁଷ ନଶେ ନାହିଁ; ଜାଣିଶୁଣି ତାହାର ଲାଭ ନେଉଥିବା ଲୋକମାନେ ମଧ୍ୟ ସେଇ ପାପଫଳର ଭାଗୀ ହୁଅନ୍ତି।

Verse 7

येडपि तत्रापिबन क्षीरं घृतं दधि च मानवा: । ब्राह्मणा: सहराजन्या: सर्वे नरकमाविशन्‌,जहाँ वे गौएँ हरकर लायी गयी थीं, वहाँ जिन मनुष्योंने उनके दूध, दही और घीका उपभोग किया, वे सभी ब्राह्मण और क्षत्रिय आदि नरकमें पड़े

ଯେଉଁ ସ୍ଥାନରେ ସେଇ ଗାଈମାନେ ହରଣ କରି ଆଣାଯାଇଥିଲେ, ସେଠାରେ ଯେ ମନୁଷ୍ୟମାନେ ସେମାନଙ୍କ ଦୁଧ, ଘିଅ ଓ ଦହି ପିଇଲେ କିମ୍ବା ଖାଇଲେ—ବ୍ରାହ୍ମଣ ହେଉନ୍ତୁ କି କ୍ଷତ୍ରିୟ ଆଦି—ସମସ୍ତେ ନରକକୁ ପତିତ ହେଲେ। ଏହା ଦର୍ଶାଏ ଯେ ଚୋରି କିମ୍ବା ବଳପୂର୍ବକ ଆଣିଥିବା ବସ୍ତୁର ଉପଭୋଗକାରୀ ମଧ୍ୟ ଦୋଷର ସହଭାଗୀ ହୋଇ ସେଇ ପାପଭାର ବହନ କରେ।

Verse 8

जघ्नुस्ता: पयसा पुत्रांस्तथा पौत्रान्‌ विधुन्वती: । पशूनवेक्षमाणाश्च साधुवृत्तेन दम्पती,वे अपहृत हुई गौएँ जब दूसरे पशुओंको देखतीं और अपने स्वामी तथा बछड़ोंको नहीं देखती थीं, तब पीड़ासे अपने शरीरको कँपाने लगती थीं। उन दिनों सद्धावसे ही दूध देकर उन्होंने अपहरणकारी पति-पत्नीको तथा उनके पुत्रों और पौत्रोंको भी नष्ट कर दिया

ଅପହୃତ ସେଇ ଗାଈମାନେ ଅନ୍ୟ ପଶୁମାନଙ୍କୁ ଦେଖି, କିନ୍ତୁ ନିଜ ସତ୍ୟ ସ୍ୱାମୀ ଓ ବଛଡ଼ାମାନଙ୍କୁ ନ ଦେଖି ପୀଡ଼ାରେ କମ୍ପିଉଠୁଥିଲେ। ସେହି ଦିନଗୁଡ଼ିକରେ, ସାଧୁବୃତ୍ତିର ଆଡ଼ମ୍ବର କରି ଚୋରିରେ ଜୀବନ ଯାପନ କରୁଥିବା ସେଇ ଦମ୍ପତିକୁ—ତାଙ୍କ ପୁତ୍ର ଓ ପୌତ୍ର ସହିତ—ନିଜ ପାଳ ଦ୍ୱାରା ନାଶ କରିଦେଲେ।

Verse 9

अहं तत्रावसं राजन ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय: । तासां मे रजसा ध्वस्तं भैक्षमासीन्नराधिप,राजन! मैं भी उसी गाँवमें ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक जितेन्द्रियभावसे निवास करता था। नरेश्वर! एक दिन उन्हीं गौओंके दूध एवं धूलके कणसे मेरा भिक्षात्र भी दूषित हो गया

ଚାଣ୍ଡାଳ କହିଲା—ରାଜନ! ମୁଁ ମଧ୍ୟ ସେଇ ଗାଁରେ ବ୍ରହ୍ମଚାରୀ ଓ ଜିତେନ୍ଦ୍ରିୟ ହୋଇ ବସୁଥିଲି। ନରାଧିପ! ଗୋଟିଏ ଦିନ ସେଇ ଗାଈମାନଙ୍କ ଉଠାଇଥିବା ଧୂଳିକଣାରେ ମୋର ଭିକ୍ଷାନ୍ନ ମଧ୍ୟ ଦୂଷିତ ହୋଇଗଲା।

Verse 10

चाण्डालो<हं ततो राजन्‌ भुक्त्वा तदभवं नृप । ब्रह्मस्वहारी च नृप: सो<प्रतिष्ठां गतिं ययौ,महाराज! उस भिक्षान्नको खाकर मैं चाण्डाल हो गया और ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेवाले वे राजा भी नरकगामी हो गये

ଚାଣ୍ଡାଳ କହିଲା—ମହାରାଜ! ସେଇ ଦୂଷିତ ଭିକ୍ଷାନ୍ନ ଖାଇ ମୁଁ ଚାଣ୍ଡାଳ ହୋଇଗଲି। ଏବଂ ବ୍ରାହ୍ମଣର ଧନ ଅପହରଣ କରିଥିବା ସେଇ ରାଜା ମଧ୍ୟ ଅପକୀର୍ତ୍ତି ପାଇ ଧ୍ୱଂସମୟ ଗତିକୁ ଗଲା। ତେଣୁ, କଳୁଷିତ ଅନ୍ନଭୋଜୀ ଓ ବ୍ରାହ୍ମଣ-ଧନହର୍ତ୍ତା—ଉଭୟଙ୍କ ପତନ ନିଶ୍ଚିତ।

Verse 11

इसलिये कभी किंचिन्मात्र भी ब्राह्मणके धनका अपहरण न करे। ब्राह्मणके धूल- धूसरित दुग्धरूप धनको खाकर मेरी जो दशा हुई है, उसे आप प्रत्यक्ष देख लें

ଏହିହେତୁ କେବେ ବି ଅତି ସାନ ମାତ୍ରାରେ ମଧ୍ୟ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ଧନ ଅପହରଣ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ। ଧୂଳିରେ ଧୂସରିତ, ଦୁଧ ସଦୃଶ ବୋଲି କୁହାଯାଉଥିବା ସେହି ବ୍ରାହ୍ମଣଧନ ଭୋଗ କରି ମୋର ଯେ ଦୁର୍ଦ୍ଦଶା ହୋଇଛି, ତାହାକୁ ତୁମେ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦେଖ।

Verse 12

तस्मात्‌ सोमो<प्यविक्रेय: पुरुषेण विपश्चिता । विक्रयं त्विह सोमस्य गर्हयन्ति मनीषिण:,इसीलिये विद्वान्‌ पुरुषको सोमरसका विक्रय भी नहीं करना चाहिये। मनीषी पुरुष इस जगत्‌में सोमरसके विक्रयकी बड़ी निंदा करते हैं

ଏହିହେତୁ ବିବେକୀ ପୁରୁଷ ସୋମରସକୁ ମଧ୍ୟ ବିକ୍ରୟ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ। ଏହି ଲୋକରେ ମନୀଷୀମାନେ ସୋମରସର ବ୍ୟବସାୟକୁ ଭାରି ନିନ୍ଦା କରନ୍ତି।

Verse 13

तस्माद्धरेन्न विप्रस्व॑ं कदाचिदपि किंचन । ब्रह्मस्वं रजसा ध्वस्तं भुक्त्वा मां पश्य यादृशम्‌,ये चैनं क्रीणते तात ये च विक्रीणते जना: । ते तु वैवस्वतं प्राप्य रौरवं यान्ति सर्वश: तात! जो लोग सोमरसको खरीदते हैं और जो लोग उसे बेचते हैं, वे सभी यमलोकमें जाकर रौरव नरकमें पड़ते हैं

ଏହିହେତୁ କେବେ ବି ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ସ୍ୱତ୍ତ୍ୱକୁ ଅତି ସାନ ମାତ୍ରାରେ ମଧ୍ୟ ହରଣ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ। ରଜସରେ ଧ୍ୱସ୍ତ ହୋଇଥିବା ବ୍ରହ୍ମସ୍ୱ ଭୋଗ କରି ମୁଁ ଯେପରି ହୋଇଛି, ମୋତେ ଦେଖ। ଆଉ, ତାତ! ଯେମାନେ ସୋମରସ କିଣନ୍ତି ଓ ଯେମାନେ ତାହା ବିକ୍ରୟ କରନ୍ତି—ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ବୈବସ୍ୱତ (ଯମ)ଙ୍କ ନିକଟକୁ ପହଞ୍ଚି ନିଶ୍ଚୟ ରୌରବ ନରକକୁ ଯାଆନ୍ତି।

Verse 14

सोम॑ तु रजसा ध्वस्तं विक्रीणन्‌ विधिपूर्वकम्‌ | श्रोत्रियो वार्धुषी भूत्वा न चिरं स विनश्यति,वेदवेत्ता ब्राह्मण यदि गौओंके चरणोंकी धूलि और दूधसे दूषित सोमको विधिपूर्वक बेचता है अथवा व्याजपर रुपये चलाता है तो वह जल्दी ही नष्ट हो जाता है

ଧୂଳିରେ ଦୂଷିତ ସୋମକୁ ଯଦି କୌଣସି ଶ୍ରୋତ୍ରିୟ, ବେଦବେତ୍ତା ବ୍ରାହ୍ମଣ ବିଧିପୂର୍ବକ ମଧ୍ୟ ବିକ୍ରୟ କରେ, କିମ୍ବା ବ୍ୟାଜରେ ଧନ ଚଲାଇ ‘ୱାର୍ଧୁଷୀ’ (ସୁଦଖୋରି) ହୋଇଯାଏ—ତେବେ ସେ ଦୀର୍ଘକାଳ ଟିକେ ନାହିଁ; ଶୀଘ୍ର ନଶ୍ଟ ହୁଏ।

Verse 15

नरकं त्रिंशतं प्राप्प स्वविष्ठामुपजीवति । श्वचर्यामभिमानं च सखिदारे च विप्लवम्‌

ତିରିଶଟି ନରକରେ ପତିତ ହୋଇ ସେ ନିଜ ମଳ ଖାଇ ଜୀବନ ଧାରଣ କରେ। ପରେ ସେ କୁକୁର ସଦୃଶ ଅବସ୍ଥାକୁ ଠେଲାଯାଏ; ମୋହଜନିତ ଅଭିମାନ ସହିତ ତାହାର ଗୃହସ୍ଥଜୀବନ ଓ ସଖ୍ୟତା ସବୁ ଉଲଟିପଡ଼ି ନଶ୍ଟ ହୁଏ।

Verse 16

श्वानं वै पापिनं पश्य विवर्ण हरिणं कृशम्‌

ଚାଣ୍ଡାଳ କହିଲା—“ଦେଖ, ଏହା ପାପୀ କୁକୁର; ଏହା ବିବର୍ଣ୍ଣ ଓ କୃଶ ହରିଣ।”

Verse 17

अहं वै विपुले तात कुले धनसमन्विते

ଚାଣ୍ଡାଳ କହିଲା—“ତାତ, ମୁଁ ସତ୍ୟକୁହିଲେ ବିଶାଳ ଓ ଧନସମନ୍ୱିତ କୁଳରେ ଜନ୍ମିଥିଲି।”

Verse 18

अन्यस्मिज्जन्मनि विभो ज्ञानविज्ञानपारग: । अभवं तत्र जानानो होतान्‌ दोषान्‌ मदात्‌ सदा

“ହେ ପ୍ରଭୋ, ଅନ୍ୟ ଜନ୍ମରେ ମୁଁ ଜ୍ଞାନ ଓ ବିଜ୍ଞାନରେ ପାରଙ୍ଗତ ଥିଲି। ତଥାପି ମଦରୁ ଉତ୍ପନ୍ନ ଦୋଷଗୁଡ଼ିକୁ ଜାଣିଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ଅହଂକାର ଓ ମୋହବଶ ମୁଁ ସେଠାରେ ପୁନଃପୁନଃ ସେଗୁଡ଼ିକ କରୁଥିଲି।”

Verse 19

संरब्ध एव भूतानां पृष्ठमांसमभक्षयम्‌ | सो<हं तेन च वृत्तेन भोजनेन च तेन वै

ଚାଣ୍ଡାଳ କହିଲା—“ବିବଶ ହୋଇ ମୁଁ ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କର ପିଠିର ମାଂସ ଖାଉଥିଲି। ସେହି ଜୀବନବୃତ୍ତି ଓ ସେହି ଭୋଜନରେ ମୁଁ ଏପରି ହୋଇଛି।”

Verse 20

इमामवस्थां सम्प्राप्त: पश्य कालस्य पर्ययम्‌ | तात! प्रभो! मैं भी दूसरे जन्ममें धनसम्पन्न महान्‌ कुलमें उत्पन्न हुआ था। ज्ञान- विज्ञानमें पारंगत था। इन सब दोषोंको जानता था तो भी अभिमानवश सदा सब प्राणियोंपर क्रोध करता और पशुओंके पृष्ठका मांस खाता था; उसी दुराचार और अभक्ष्य- भक्षणसे मैं इस दुरवस्थाको प्राप्त हुआ हूँ। कालके इस उलट-फेरको देखिये ।। आदीप्तमिव चैलान्तं भ्रमरैरिव चार्दितम्‌

“ମୁଁ ଏହି ଅବସ୍ଥାକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୋଇଛି—କାଳର ଏହି ପରିବର୍ତ୍ତନକୁ ଦେଖ।”

Verse 21

स्वाध्यायैस्तु महत्पापं हरन्ति गृहमेधिन:

ଗୃହସ୍ଥମାନେ ଭକ୍ତିସହିତ ସ୍ୱାଧ୍ୟାୟ ଓ ଶାସ୍ତ୍ରପାଠ କଲେ ମହାପାପ ମଧ୍ୟ ଦୂର କରନ୍ତି।

Verse 22

तथा पापकृतं विप्रमाश्रमस्थं महीपते

ହେ ମହୀପତେ! ସେହିପରି ଆଶ୍ରମରେ ଥାଇ ମଧ୍ୟ ପାପ କରିଥିବା ବ୍ରାହ୍ମଣକୁ (ତଦନୁସାରେ ଗଣାଯାଏ)।

Verse 23

अहं हि पापयोन्यां वै प्रसूत: क्षत्रियर्षभ । निश्चयं नाधिगच्छामि कथं मुच्येयमित्युत,क्षत्रियशिरोमणे! मैं पापयोनिमें उत्पन्न हुआ हूँ। मुझे यह निश्चय नहीं हो पाता कि मैं किस उपायसे मुक्त हो सकूँगा?

ଚାଣ୍ଡାଳ କହିଲା—ହେ କ୍ଷତ୍ରିୟର୍ଷଭ! ମୁଁ ସତ୍ୟସତ୍ୟ ପାପଯୋନିରେ ଜନ୍ମିଛି। କେଉଁ ଉପାୟରେ ମୁଁ ମୁକ୍ତ ହେବି—ଏଥିରେ ମୋତେ କୌଣସି ନିଶ୍ଚୟ ମିଳୁନାହିଁ।

Verse 24

जातिस्मरत्वं च मम केनचित्‌ पूर्वकर्मणा । शुभेन येन मोक्ष॑ वै प्राप्तुमिच्छाम्यहं नृप,नरेश्वर! पहलेके किसी शुभ कर्मके प्रभावसे मुझे पूर्व-जन्मकी बातोंका स्मरण हो रहा है, जिससे मैं मोक्ष पानेकी इच्छा करता हूँ

ଚାଣ୍ଡାଳ କହିଲା—ହେ ନରେଶ୍ୱର! ପୂର୍ବଜନ୍ମର କୌଣସି ଶୁଭକର୍ମର ପ୍ରଭାବରେ ମୋତେ ଜାତିସ୍ମରଣ ହୋଇଛି; ସେହି ପୁଣ୍ୟବଳରୁ, ହେ ନୃପ, ମୁଁ ଏବେ ମୋକ୍ଷ ପାଇବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି।

Verse 25

त्वमिमं सम्प्रपन्नाय संशयं ब्रूहि पृच्छते । चाण्डालत्वात्‌ कथमहं मुच्येयमिति सत्तम,सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ! मैं आपकी शरणमें आकर अपना यह संशय पूछ रहा हूँ। आप मुझे इसका समाधान बताइये। मैं चाण्डाल-योनिसे किस प्रकार मुक्त हो सकता हूँ?

ହେ ସତ୍ତମ, ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ! ମୁଁ ଆପଣଙ୍କ ଶରଣ ନେଇ ଏହି ସନ୍ଦେହ ପଚାରୁଛି; କୃପାକରି କହନ୍ତୁ—ଚାଣ୍ଡାଳତ୍ୱରୁ ମୁଁ କିପରି ମୁକ୍ତ ହେବି?

Verse 26

राजन्य उवाच चाण्डाल प्रतिजानीहि येन मोक्षमवाप्स्ययसि । ब्राह्मणार्थे त्यजन्‌ प्राणान्‌ गतिमिष्टामवाप्स्यसि,क्षत्रियने कहा--चाण्डाल! तू उस उपायको समझ ले, जिससे तुझे मोक्ष प्राप्त होगा। यदि तू ब्राह्मणकी रक्षाके लिये अपने प्राणोंका परित्याग करे तो तुझे अभीष्ट गति प्राप्त होगी

କ୍ଷତ୍ରିୟ କହିଲେ—“ହେ ଚାଣ୍ଡାଳ! ଯେ ପ୍ରତିଜ୍ଞା ଦ୍ୱାରା ତୁମେ ମୋକ୍ଷ ପାଇବ, ସେହି ପ୍ରତିଜ୍ଞା ଗ୍ରହଣ କର। ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ହିତରେ ଯଦି ତୁମେ ପ୍ରାଣ ତ୍ୟାଗ କର, ତେବେ ତୁମେ ଅଭୀଷ୍ଟ ପରମ ଗତି ପାଇବ।”

Verse 27

दत्त्वा शरीर क्रव्याद्धयो रणाग्नौ द्विजहेतुकम्‌ । हुत्वा प्राणान्‌ प्रमोक्षस्ते नान्‍्यथा मोक्षमर्हसि,यदि ब्राह्मणकी रक्षाके लिये तू अपना यह शरीर समराग्निमें होमकर कच्चा मांस खानेवाले जीव-जन्तुओंको बाँट दे तो प्राणोंकी आहुति देनेपर तेरा छुटकारा हो सकता है, अन्यथा तू मोक्ष नहीं पा सकेगा

କ୍ଷତ୍ରିୟ କହିଲେ—“ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ରକ୍ଷା ପାଇଁ ଯଦି ତୁମେ ନିଜ ଶରୀରକୁ ରଣାଗ୍ନିରେ ହୋମ କରି ମାଂସଭକ୍ଷୀ ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କୁ ଅର୍ପଣ କର, ତେବେ ପ୍ରାଣାହୁତି ଦ୍ୱାରା ତୁମର ମୁକ୍ତି ସମ୍ଭବ; ନଚେତ୍ ତୁମେ ମୋକ୍ଷର ଅଧିକାରୀ ନୁହଁ।”

Verse 28

भीष्म उवाच इत्युक्त: स तदा तेन ब्रह्मास्वार्थ परंतप । हुत्वा रणमुखे प्राणान्‌ गतिमिष्टामवाप ह,भीष्मजी कहते हैं--परंतप! क्षत्रियके ऐसा कहनेपर उस चाण्डालने ब्राह्मणके धनकी रक्षाके लिये युद्धके मुहानेपर अपने प्राणोंकी आहुति दे अभीष्ट गति प्राप्त कर ली

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—“ହେ ପରନ୍ତପ! କ୍ଷତ୍ରିୟ ଏପରି କହିବା ପରେ ସେଇ ଚାଣ୍ଡାଳ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ଧନ ରକ୍ଷା ପାଇଁ ରଣମୁଖରେ ପ୍ରାଣାହୁତି ଦେଇ ଅଭୀଷ୍ଟ ଗତି ପାଇଲା।”

Verse 29

तस्माद्‌ रक्ष्यं त्वया पुत्र ब्रह्म॒स्वं भरतर्षभ । यदीच्छसि महाबाहो शाश्वतीं गतिमात्मन:,बेटा! भरतश्रेष्ठ) महाबाहो! यदि तुम सनातन गति पाना चाहते हो तो तुम्हें ब्राह्मणके धनकी पूरी रक्षा करनी चाहिये

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—“ଏହେତୁ, ପୁତ୍ର! ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ, ହେ ମହାବାହୋ! ଯଦି ତୁମେ ନିଜ ପାଇଁ ଶାଶ୍ୱତ ପରମ ଗତି ଚାହ, ତେବେ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ଧନକୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ରକ୍ଷା କର।”

Verse 100

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें अगस्त्य और भ्रगुका संवादनामक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଅନୁଶାସନପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଦାନଧର୍ମପର୍ବରେ ‘ଅଗସ୍ତ୍ୟ–ଭୃଗୁ ସଂବାଦ’ ନାମକ ଶତତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 101

इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि राजन्यचाण्डालसंवादो नामैकोत्तरशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवादविषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଅନୁଶାସନପର୍ବର ଦାନଧର୍ମପର୍ବରେ ‘କ୍ଷତ୍ରିୟ (ରାଜନ୍ୟ) ଓ ଚାଣ୍ଡାଳଙ୍କ ସମ୍ବାଦ’ ନାମକ ଏକଶେ ଏକତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 156

तुलया धारयन्‌ धर्ममभिमान्यतिरिच्यते । वह तीस नरकोंमें पड़कर अंतमें अपनी ही विष्ठापर जीनेवाला कीड़ा होता है। कुत्तोंको पालना, अभिमान तथा मित्रकी स्त्रीसे व्यभिचार--इन तीनों पापोंको तराजूपर रखकर यदि धर्मतः तौला जाय तो अभिमानका ही पलड़ा भारी होगा

ଚାଣ୍ଡାଳ କହିଲା—“ଧର୍ମକୁ ତୁଳାରେ ତୋଳିଲେ ଅଭିମାନ ହିଁ ଅଧିକ ଭାରୀ ପଡ଼େ।”

Verse 166

अभिमानेन भूतानामिमां गतिमुपागतम्‌ | आप मेरे इस पापी कुत्तेको देखिये, यह कान्तिहीन, सफेद और दुर्बल हो गया है। यह पहले मनुष्य था। परंतु समस्त प्राणियोंके प्रति अभिमान रखनेके कारण इस दुर्गतिको प्राप्त हुआ है

ଚାଣ୍ଡାଳ କହିଲା—“ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ପ୍ରତି ଅଭିମାନ ରଖିଥିବାରୁ ସେ ଏହି ଅବସ୍ଥାକୁ ପହଞ୍ଚିଛି। ମୋର ଏହି ପାପୀ କୁକୁରଟିକୁ ଦେଖ—ଏହା କାନ୍ତିହୀନ, ଫିକା ଓ ଦୁର୍ବଳ ହୋଇଯାଇଛି। ଏହା ପୂର୍ବେ ମନୁଷ୍ୟ ଥିଲା; କିନ୍ତୁ ସର୍ବ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ପ୍ରତି ଅଭିମାନ ରଖିବାରୁ ଏହି ଦୁର୍ଗତି ପାଇଛି।”

Verse 203

धावमानं सुसंरब्धं पश्य मां रजसान्वितम्‌ । मेरी दशा ऐसी हो रही है, मानो मेरे कपड़ोंके छोरमें आग लग गयी हो अथवा तीखे मुखवाले भ्रमरोंने मुझे डंक मार-मारकर पीड़ित कर दिया हो। मैं रजोगुणसे युक्त हो अत्यंत रोष और आवेशमें भरकर चारों ओर दौड़ रहा हूँ। मेरी दशा तो देखिये

ମୋତେ ଦେଖ—ରଜୋଗୁଣରେ ଯୁକ୍ତ ହୋଇ, ଅତ୍ୟନ୍ତ କ୍ରୋଧ ଓ ଆବେଗରେ ଭରି ମୁଁ ଚାରିଦିଗକୁ ଧାଉଛି। ମୋର ଦଶା ଏମିତି, ଯେପରି ମୋ ପୋଷାକର ଛୋରେ ଆଗ ଲାଗିଛି, କିମ୍ବା ତୀକ୍ଷ୍ଣମୁଖ ଭ୍ରମରମାନେ ପୁନଃପୁନଃ ଡ଼ଙ୍କ ମାରି ମୋତେ ପୀଡ଼ା ଦେଇଛନ୍ତି।

Verse 216

दानै: पृथग्विधेश्वापि यथा प्राहुर्मनीषिण: । गृहस्थ मनुष्य वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायद्वारा तथा नाना प्रकारके दानोंसे अपने महान्‌ पापको दूर कर देते हैं। जैसा कि मनीषी पुरुषोंका कथन है

ଚାଣ୍ଡାଳ କହିଲା—“ମନୀଷୀମାନେ ଯେପରି କହିଛନ୍ତି, ଗୃହସ୍ଥ ମନୁଷ୍ୟ ବେଦ-ଶାସ୍ତ୍ରର ସ୍ୱାଧ୍ୟାୟ ଓ ନାନାପ୍ରକାର ଦାନଦ୍ୱାରା ନିଜର ମହାପାପକୁ ଦୂର କରେ।”

Verse 226

सर्वसंगविनिर्मुक्त छन्दांस्युत्तारयन्त्युत । पृथ्वीनाथ! आश्रममें रहकर सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्ता हो वेदपाठ करनेवाले ब्राह्मगको यदि वह पापाचारी हो तो भी उसके द्वारा पढ़े जानेवाले वेद उसका उद्धार कर देते हैं

ଚାଣ୍ଡାଳ କହିଲା—ହେ ପୃଥ୍ୱୀନାଥ! ବେଦୀୟ ଛନ୍ଦ ନିଶ୍ଚୟ ତରାଇ ନେଇଥାଏ। ଆଶ୍ରମରେ ରହି ସମସ୍ତ ଆସକ୍ତିରୁ ମୁକ୍ତ ହୋଇ ବେଦପାଠ କରୁଥିବା ବ୍ରାହ୍ମଣ ଆଚରଣରେ ପାପୀ ହେଲେ ମଧ୍ୟ, ସେ ପଢ଼ୁଥିବା ବେଦମାନେ ହିଁ ତାହାର ଉଦ୍ଧାରର ଉପାୟ ହୁଅନ୍ତି।

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns the ethical status and karmic cost of taking brahmasva—property designated for brāhmaṇas and ritual purposes—and whether participation in, benefit from, or facilitation of such appropriation implicates wider groups in the resulting consequences.

The chapter’s upadeśa is that dharma is enforced through karmic causality at both individual and collective levels: sacred resources require protection, commerce in certain ritual goods (notably soma) is censured, and ethical recovery is pursued through disciplined conduct rather than opportunistic gain.

Rather than a formal phalaśruti, the chapter ends with a directive conclusion: Bhīṣma instructs Yudhiṣṭhira to safeguard brahmasva as a condition for attaining a ‘śāśvatī’ (enduring) and ‘uttamā’ (higher) gati, functioning as a practical soteriological framing.