महाभिष-गङ्गा-दर्शनं वसूनां शापकथनं च
Mahābhiṣa Encounters Gaṅgā; The Vasus Explain Their Curse
ययातिरुवाच हित्वा सो$सून् सुप्तवन्निष्टनित्वा पुरोधाय सुकृतं दुष्कृतं वा । अन््यां योनिं पवनाग्रानुसारी हित्वा देह भजते राजसिंह,ययाति बोले--राजसिंह! जैसे मनुष्य श्वास लेते हुए प्राणयुक्त स्थूल शरीरको छोड़कर स्वप्रमें विचरण करता है, वैसे ही यह चेतन जीवात्मा अस्फुट शब्दोच्चारणके साथ इस मृतक स्थूल शरीरको त्यागकर सूक्ष्म शरीरसे संयुक्त होता है और फिर पुण्य अथवा पापको आगे रखकर वायुके समान वेगसे चलता हुआ अन्य योनिको प्राप्त होता है
yayātir uvāca hitvā so'sūn suptavan niṣṭanītvā purodhāya sukṛtaṃ duṣkṛtaṃ vā | anyāṃ yoniṃ pavanāgrānusārī hitvā dehaṃ bhajate rājasiṃha ||
ଯୟାତି କହିଲେ—ହେ ରାଜସିଂହ! ଯେପରି ମଣିଷ ପ୍ରାଣ ଥିଲେ ମଧ୍ୟ ମନୋହର ଭାବେ ସ୍ଥୂଳ ଦେହକୁ ଛାଡ଼ି ସ୍ୱପ୍ନରେ ବିଚରେ, ସେପରି ଏହି ଚେତନ ଜୀବାତ୍ମା ଅସ୍ପଷ୍ଟ ଉଚ୍ଚାର ସହିତ ଏହି ମୃତ ସ୍ଥୂଳ ଦେହକୁ ତ୍ୟାଗ କରି ସୂକ୍ଷ୍ମ ଦେହ ଧାରଣ କରେ; ଏବଂ ପୁଣ୍ୟ କିମ୍ବା ପାପକୁ ଆଗରେ ରଖି ପବନ ସମ ବେଗରେ ଚାଲି ଅନ୍ୟ ଯୋନିକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ।
अष्टक उवाच