ययाति–शक्रसंवादः
Speech-Ethics and Forbearance in the Celestial Court
रूपाभिजनशीलिै हि त्वं राजन् वेत्थ मां सदा । सात्वां याचे प्रसाद्याहमृतुं देहि नराधिप,शर्मिष्ठाने कहा--नहुषनन्दन! चन्द्रमा, इन्द्र, विष्णु, यम, वरुण अथवा आपके महलमें कौन किसी स्त्रीकी ओर दृष्टि डाल सकता है? (अतएव यहाँ मैं सर्वथा सुरक्षित हूँ) महाराज! मेरे रूप, कुल और शील कैसे हैं, यह तो आप सदासे ही जानते हैं। मैं आज आपको प्रसन्न करके यह प्रार्थना करती हूँ कि मुझे ऋतुदान दीजिये--मेरे ऋतुकालको सफल बनाइये
rūpābhijanaśīlaiḥ hi tvaṃ rājan vettha māṃ sadā | sā tvāṃ yāce prasādyāham ṛtuṃ dehi narādhipa ||
ହେ ରାଜନ୍! ମୋର ରୂପ, କୁଳ ଓ ଶୀଳ ଆପଣ ସଦାଠାରୁ ଜାଣନ୍ତି। ତେଣୁ ଆପଣଙ୍କୁ ପ୍ରସନ୍ନ କରି ମୁଁ ବିନୟରେ ଯାଚନା କରୁଛି—ହେ ନରାଧିପ! ମୋତେ ଋତୁଦାନ ଦିଅନ୍ତୁ; ମୋ ଋତୁକାଳକୁ ସଫଳ କରନ୍ତୁ।
वैशम्पायन उवाच