Yayāti’s Abdication and Pūru’s Coronation (ययाति-पूोरु-राज्याभिषेकः)
(यद्येव देवान् गच्छेस्त्वं मां च त्यक्त्वा ग्रहाधिप । सर्वत्यागं ततः कृत्वा प्रविशामि हुताशनम् ।।) ग्रहेश्वरर यदि आप मुझे छोड़कर देवताओंके पक्षमें चले जायँगे तो मैं भी सर्वस्व त्याग कर जलती आगममें कूद पड़ूँगा। शुक्र उवाच समुद्र प्रविशध्वं वा दिशो वा द्रवतासुरा: । दुहितुर्नाप्रियं सोढुं शक्तो5हं दयिता हि मे,शुक्राचार्यने कहा--असुरो! तुमलोग समुद्रमें घुस जाओ अथवा चारों दिशाओंमें भाग जाओ; मैं अपनी पुत्रीके प्रति किया गया अप्रिय बर्ताव नहीं सह सकता; क्योंकि वह मुझे अत्यन्त प्रिय है
śukra uvāca | samudraṁ praviśadhvaṁ vā diśo vā dravatāsurāḥ | duhitur nāpriyaṁ soḍhuṁ śakto 'haṁ dayitā hi me ||
ଶୁକ୍ର କହିଲେ— ହେ ଅସୁରମାନେ! ତୁମେ ସମୁଦ୍ରରେ ପ୍ରବେଶ କର କିମ୍ବା ଚାରି ଦିଗକୁ ପଳାଅ। ମୋ କନ୍ୟା ପ୍ରତି କରାଯାଇଥିବା ଅପ୍ରିୟ ବ୍ୟବହାରକୁ ମୁଁ ସହିପାରିବି ନାହିଁ; କାରଣ ସେ ମୋତେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରିୟ।
शुक्र उवाच