ययातिः शर्मिष्ठायाः ऋतुप्रार्थनां धर्मसंवादं च शृणोति
Yayāti and Śarmiṣṭhā: request in ṛtu and discourse on truth and dharma
यत्रोषितं विशालाक्षि त्वया चन्द्रनिभानने । तत्राहमुषितो भद्रे कुक्षौ काव्यस्थ भामिनि,कचने कहा--उत्तम व्रतका आचरण करनेवाली सुन्दरी! तुम मुझे ऐसे कार्यमें लगा रही हो, जिसमें लगाना कदापि उचित नहीं है। शुभे! तुम मेरे ऊपर प्रसन्न होओ। तुम मेरे लिये गुरुसे भी बढ़कर गुरुतर हो। विशाल नेत्र तथा चन्द्रमाके समान मुखवाली भागमिनि! शुक्राचार्यके जिस उदरमें तुम रह चुकी हो, उसीमें मैं भी रहा हूँ। इसलिये भटद्रे! धर्मकी दृष्टिसे तुम मेरी बहिन हो। अतः सुमध्यमे! मुझसे ऐसी बात न कहो। कल्याणी। मैं तुम्हारे यहाँ बड़े सुखसे रहा हूँ। तुम्हारे प्रति मेरे मनमें तनिक भी रोष नहीं है
kaca uvāca | yatroṣitaṃ viśālākṣi tvayā candranibhānane | tatrāham uṣito bhadre kukṣau kāvyastha bhāmini ||
କଚ କହିଲେ—ହେ ବିଶାଳନୟନୀ, ହେ ଚନ୍ଦ୍ରମୁଖୀ! ଯେଉଁଠାରେ ତୁମେ ବସିଥିଲ, ଭଦ୍ରେ, ସେଠାରେ ମୁଁ ମଧ୍ୟ ବସିଥିଲି—କାବ୍ୟ (ଶୁକ୍ରାଚାର୍ଯ୍ୟ)ଙ୍କ ଗର୍ଭରେ, ହେ ଭାମିନୀ। ତେଣୁ ଧର୍ମଦୃଷ୍ଟିରେ ତୁମେ ମୋର ଭଉଣୀ। ମୋ ପାଖରୁ ଏପରି ସମ୍ପର୍କ ମାଗନି। ତୁମ ଘରେ ମୁଁ ସୁଖରେ ରହିଛି; ତୁମ ପ୍ରତି ମୋ ମନରେ ରୋଷ ଲେଶମାତ୍ର ନାହିଁ।
कच उवाच