अग्निशाप-प्रसंगः
Agni’s Curse and the Restoration of Ritual Order
ऑपन- मा बछ। अर सप्तमो<्ध्याय: शापसे कुपित हुए अग्निदेवका अदृश्य होना और ब्रद्माजीका उनके शापको संकुचित करके उन्हें प्रसन्न करना सौतिरुवाच शप्तस्तु भुगुणा वद्िः क्ुद्धो वाक्यमथाब्रवीत् । किमिदं साहसं ब्रह्मन् कृतवानसि मां प्रति,उग्रश्रवाजी कहते हैं--महर्षि भूगुके शाप देनेपर अग्निदेवने कुपित होकर यह बात कही--“ब्रह्मन! तुमने मुझे शाप देनेका यह दुस्साहसपूर्ण कार्य क्यों किया हे?”
sautir uvāca — śaptaḥ tu bhṛguṇā vahniḥ kruddho vākyam athābravīt | kim idaṃ sāhasaṃ brahman kṛtavān asi māṃ prati ||
ସୌତି କହିଲେ—ଭୃଗୁଙ୍କ ଶାପ ପାଇ ଅଗ୍ନିଦେବ କ୍ରୋଧିତ ହୋଇ କହିଲେ—“ହେ ବ୍ରହ୍ମନ୍! ମୋ ପ୍ରତି ତୁମେ ଏହି ଦୁସ୍ସାହସ କାହିଁକି କଲ? ମୋତେ ଶାପ ଦେବାକୁ କାହିଁକି ଧୈର୍ୟ କଲ?”
शौनक उवाच