Ādi Parva, Adhyāya 47 — Janamejaya’s Sarpa-satra: Vow, Preparation, and the Onset of the Serpent Offering
उत्थापयिष्ये यद्येन॑ ध्रुवं कोपं करिष्यति । धर्मलोपो भवेदस्य संध्यातिक्रमणे ध्रुवम्,'यदि इन्हें जगाऊँगी तो निश्चय ही इन्हें मुझपर क्रोध होगा और यदि सोते-सोते संध्योपासनका समय बीत गया तो अवश्य इनके धर्मका लोप हो जायगा, ऐसी दशामें धर्मात्मा पतिका कोप स्वीकार करूँ या उनके धर्मका लोप? इन दोनोंमें धर्मका लोप ही भारी जान पड़ता है।” अतः जिससे उनके धर्मका लोप न हो, वही कार्य करनेका उसने निश्चय किया
utthāpayiṣye yady enaṁ dhruvaṁ kopaṁ kariṣyati | dharmalopo bhaved asya sandhyātikramaṇe dhruvam ||
ତକ୍ଷକା ମନେମନେ ଚିନ୍ତା କଲା— “ମୁଁ ଯଦି ତାଙ୍କୁ ଜଗାଏ, ନିଶ୍ଚୟ ମୋପରେ କ୍ରୋଧ କରିବେ। କିନ୍ତୁ ସେ ଶୋଇଥିବାବେଳେ ସନ୍ଧ୍ୟୋପାସନାର ସମୟ ଅତିକ୍ରମ କଲେ, ତାଙ୍କର ଧର୍ମ ନିଶ୍ଚୟ ହ୍ରାସ ପାଇବ। ଏମିତି ଅବସ୍ଥାରେ ଧର୍ମାତ୍ମା ପତିଙ୍କ କୋପ ସହିବି କି, ନା ତାଙ୍କର ଧର୍ମହାନିକୁ ଅନୁମତି ଦେବି? ଏ ଦୁଇଟି ମଧ୍ୟରେ ଧର୍ମଲୋପ ଅଧିକ ଭାରୀ।” ତେଣୁ ତାଙ୍କର ଧର୍ମକୁ କ୍ଷତି ନ ହେବା ପାଇଁ ଯେପରି କରିବା ଉଚିତ, ସେହିପରି କରିବାକୁ ସେ ନିଶ୍ଚୟ କଲା।
तक्षक उवाच