अध्याय ३४ — एलापत्रस्योपदेशः
Elāpatra’s Counsel on the Nāgas’ Deliverance
ततः सुपर्ण: परमप्रहर्षवान् विह्ृृत्य मात्रा सह तत्र कानने | भुजड़भक्ष: परमार्चित: खगै- रहीनकीर्तिविनितामनन्दयत्,उस दिनसे सुन्दर पंखवाले गरुड अत्यन्त प्रसन्न हो अपनी माताके साथ रहकर वहाँ वनमें इच्छानुसार घूमने-फिरने लगे। वे सर्पोंको खाते और पक्षियोंसे सादर सम्मानित होकर अपनी उज्ज्वल कीर्ति चारों ओर फैलाते हुए माता विनताको आनन्द देने लगे
tataḥ suparṇaḥ paramapraharṣavān vihṛtya mātrā saha tatra kānane | bhujaṅgabhakṣaḥ paramārcitaḥ khagaiḥ rahīnākīrtivinītām ānandayat ||
ତାପରେ ପରମ ହର୍ଷରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ସୁପର୍ଣ୍ଣ (ଗରୁଡ) ନିଜ ମାତା ସହ ସେଇ ଅରଣ୍ୟରେ ଇଚ୍ଛାମତେ ବିହାର କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ। ସର୍ପଭକ୍ଷକ ସେଇ ଖଗକୁ ପକ୍ଷୀମାନେ ପରମ ସମ୍ମାନ ଦେଲେ; ଏବଂ ସେ ନିଜ ନିର୍ମଳ କୀର୍ତ୍ତିକୁ ସମସ୍ତ ଦିଗରେ ପ୍ରସାରିତ କରି ବିନତାଙ୍କୁ ଆନନ୍ଦିତ କଲେ।
शक्र उवाच