स मांसरुधिरौचैश्व॒ वसाभिश्चापि तर्पित:,कृष्णमशभ्युद्यतास्त्रं च नादं मुमुचुरुल्बणम् | उन्होंने उस जलते हुए वनको और मारनेके लिये अस्त्र उठाये हुए श्रीकृष्ण तथा अर्जुनको देखा। उत्पात और आर्तनादके शब्दसे उस वनमें खड़े हुए वे सभी प्राणी संत्रस्त- से हो उठे थे। उस वनको अनेक प्रकारसे दग्ध होते देख और अस्त्र उठाये हुए श्रीकृष्णपर दृष्टि डाल भयानक आर्तनाद करने लगे इस प्रकार वनजन्तुओंके मांस, रुधिर और मेदेके समूहसे अत्यन्त तृप्त हो अग्निदेव ऊपर आकाशचारी होकर धूमरहित हो गये। उनकी आँखें चमक उठीं, जिह्नामें दीप्ति आ गयी और उनका विशाल मुख भी अत्यन्त तेजसे प्रकाशित होने लगा
sa māṃsa-rudhiraucaiś ca vasābhiś cāpi tarpitaḥ, kṛṣṇam abhyudyatāstraṃ ca nādaṃ mumucur ulbaṇam |
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମାଂସ, ରକ୍ତ ଓ ମେଦର ଢେରରେ ତୃପ୍ତ ହୋଇଥିବା ସେହି ବନଚର ପ୍ରାଣୀମାନେ, ଅସ୍ତ୍ର ଉଠାଇଥିବା ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ (ଅର୍ଜୁନ ସହ) ଦେଖି ଘୋର ନାଦ କଲେ। ଦହିଉଠୁଥିବା ଅରଣ୍ୟରେ ଅପଶକୁନ ଓ ଆର୍ତ୍ତନାଦର ଭୟରେ ସେମାନେ ଉଚ୍ଚସ୍ୱରେ ବିଲାପ କଲେ। ଏହିପରି ମାଂସ-ରକ୍ତ-ମେଦର ବିଶାଳ ସମୂହରେ ପରମ ତୃପ୍ତ ହୋଇ ଅଗ୍ନିଦେବ ଉପର ଆକାଶକୁ ଉଠିଗଲେ; ସେ ଧୂମରହିତ ହେଲେ, ତାଙ୍କ ଚକ୍ଷୁ ଜ୍ୱଲିଲା, ଜିହ୍ୱା ଦୀପ୍ତ ହେଲା, ଏବଂ ବିଶାଳ ମୁଖ ତେଜରେ ପ୍ରକାଶିତ ହେଲା।
वैशम्पायन उवाच