Jarītā–Śārṅgā-saṃvāda: Ākhu-haraṇa and the Approach of Agni (आखुहरणं अग्न्यागमनश्च)
स च राजाकरोद् यत्नं महान्तं ससुह्ृज्जन: । प्रणिपातेन सान्त्वेन दानेन च महायशा:,उन महायशस्वी नरेशने अपने सुहृदोंको साथ लेकर इस कार्यके लिये बहुत बड़ा प्रयत्न किया। पैरोंपर पड़कर, सान्त्वनापूर्ण वचन कहकर और इच्छानुसार दान देकर बार-बार निरालस्यभावसे ऋत्विजोंको मनाया, उनसे यज्ञ करानेके लिये अनुनय-विनय की; परंतु उन्होंने अमिततेजस्वी नरेशके मनोरथको सफल नहीं किया
sa ca rājākarod yatnaṃ mahāntaṃ sa-suhṛj-janaḥ | praṇipātena sāntvena dānena ca mahāyaśāḥ ||
ସେହି ମହାଯଶସ୍ବୀ ରାଜା ନିଜ ସୁହୃଦମଣ୍ଡଳୀ ସହ ଏହି କାର୍ଯ୍ୟ ପାଇଁ ମହାନ ପ୍ରୟାସ କଲେ। ପ୍ରଣିପାତ କରି, ସାନ୍ତ୍ୱନାମୟ ବଚନ କହି, ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ଦାନ ଦେଇ, ସେ ପୁନଃପୁନଃ ଅକ୍ଳାନ୍ତ ଭାବେ ଋତ୍ୱିଜମାନଙ୍କୁ ମନାଇ ଯଜ୍ଞ କରାଇବାକୁ ଅନୁନୟ କଲେ; କିନ୍ତୁ ସେମାନେ ସେହି ଅମିତତେଜସ୍ବୀ ନରେଶଙ୍କ ମନୋରଥ ପୂରଣ କଲେ ନାହିଁ।
वैशम्पायन उवाच