Śārṅgakānāṃ Avināśaḥ (Why the Śārṅga Birds Were Spared) | शार्ङ्गकानामविनाशः
अभ्यर्च्य ब्राह्म॒णान् पार्थो द्रौपदीमभिजग्मिवान् | इसके बाद राजा युधिष्ठिर और भीमके चरण छुये। तदनन्तर नकुल और सहदेवने आकर अर्जुनको प्रणाम किया। अर्जुनने भी हर्षमें भरकर उन दोनोंको हृदयसे लगा लिया और उनसे मिलकर बड़ी प्रसन्नताका अनुभव किया। फिर वहाँ राजासे मिलकर नियमपूर्वक एकाग्रचित्त हो उन्होंने ब्राह्मणोंका पूजन किया। तत्पश्चात् वे द्रौषपदीके समीप गये ।। १५३ || त॑ द्रौपदी प्रत्युवाच प्रणयात् कुरुनन्दनम्,द्रौपदीने प्रणणकोपवश कुरुनन्दन अर्जुनसे कहा--'कुन्तीकुमार! यहाँ क्यों आये हो, वहीं जाओ, जहाँ वह सात्वतवंशकी कन्या सुभद्रा है। सच है, बोझको कितना ही कसकर बाँधा गया हो, जब उसे दूसरी बार बाँधते हैं, तब पहला बन्धन ढीला पड़ जाता है (यही हालत मेरे प्रति तुम्हारे प्रेमबन्धनकी है)
vaiśampāyana uvāca | abhyarcya brāhmaṇān pārtho draupadīm abhijagmivān |
ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ବିଧିପୂର୍ବକ ପୂଜା କରି ପାର୍ଥ (ଅର୍ଜୁନ) ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କ ସମୀପକୁ ଗଲେ।
वैशम्पायन उवाच