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Shloka 16

Śārṅgakānāṃ Avināśaḥ (Why the Śārṅga Birds Were Spared) | शार्ङ्गकानामविनाशः

अभ्यर्च्य ब्राह्म॒णान्‌ पार्थो द्रौपदीमभिजग्मिवान्‌ | इसके बाद राजा युधिष्ठिर और भीमके चरण छुये। तदनन्तर नकुल और सहदेवने आकर अर्जुनको प्रणाम किया। अर्जुनने भी हर्षमें भरकर उन दोनोंको हृदयसे लगा लिया और उनसे मिलकर बड़ी प्रसन्नताका अनुभव किया। फिर वहाँ राजासे मिलकर नियमपूर्वक एकाग्रचित्त हो उन्होंने ब्राह्मणोंका पूजन किया। तत्पश्चात्‌ वे द्रौषपदीके समीप गये ।। १५३ || त॑ द्रौपदी प्रत्युवाच प्रणयात्‌ कुरुनन्दनम्‌,द्रौपदीने प्रणणकोपवश कुरुनन्दन अर्जुनसे कहा--'कुन्तीकुमार! यहाँ क्‍यों आये हो, वहीं जाओ, जहाँ वह सात्वतवंशकी कन्या सुभद्रा है। सच है, बोझको कितना ही कसकर बाँधा गया हो, जब उसे दूसरी बार बाँधते हैं, तब पहला बन्धन ढीला पड़ जाता है (यही हालत मेरे प्रति तुम्हारे प्रेमबन्धनकी है)

vaiśampāyana uvāca | abhyarcya brāhmaṇān pārtho draupadīm abhijagmivān |

ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ବିଧିପୂର୍ବକ ପୂଜା କରି ପାର୍ଥ (ଅର୍ଜୁନ) ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କ ସମୀପକୁ ଗଲେ।

अभ्यर्च्यhaving worshipped
अभ्यर्च्य:
Karma
TypeVerb
Rootअभि+अर्च्
Formल्यप् (क्त्वा-प्रत्ययार्थक अव्यय), कर्तरि, पूर्वकाल (absolutive)
ब्राह्मणान्Brahmins
ब्राह्मणान्:
Karma
TypeNoun
Rootब्राह्मण
FormMasculine, Accusative, Plural
पार्थःPartha (Arjuna)
पार्थः:
Karta
TypeNoun
Rootपार्थ
FormMasculine, Nominative, Singular
द्रौपदीम्Draupadi
द्रौपदीम्:
Karma
TypeNoun
Rootद्रौपदी
FormFeminine, Accusative, Singular
अभिजग्मिवान्went to / approached
अभिजग्मिवान्:
Karta
TypeVerb
Rootअभि+गम्
Formक्तवतु (परिप्रयोगः: जग्मिवान्), Perfect (periphrastic perfect sense), Third, Singular, Masculine

वैशम्पायन उवाच

V
Vaiśampāyana
A
Arjuna (Pārtha)
D
Draupadī
B
Brāhmaṇas
Y
Yudhiṣṭhira
B
Bhīma
N
Nakula
S
Sahadeva
S
Subhadrā
K
Kuntī (implied by 'Kuntīkumar')
S
Sāttvata/Yādava lineage