पराशरस्य राक्षससत्रनिवृत्तिः | Paraśara’s Rakṣasa-Satra and Its Cessation
प्रीतिसंयोगयुक्ताभिरद्धि: प्रह्लादयस्व मे । पुष्पायुध॑ दुराधर्ष प्रचण्डशरकार्मुकम्,“मैं सर्वथा तुम्हारे अधीन हूँ, मुझपर प्रसन्न हो जाओ। महानुभावे! मुझ भक्तको अंगीकार करो। वरारोहे! विशाल नेत्रोंवाली अंगने! जबसे मैंने तुम्हें देखा है, तभीसे कामदेव मेरे अन्तः:करणको अपने बाणोंद्वारा घायल कर रहा है। कमललोचने! तुम प्रेमपूर्वक समागमके जलसे मेरे कामाग्निजनित दाहको बुझाकर मुझे आह्वाद प्रदान करो। कल्याणि! तुम्हारे दर्शनसे उत्पन्न हुआ कामदेव फूलोंके आयुध लेकर भी अत्यन्त दुर्धर्ष हो रहा है। उसके धनुष और बाण दोनों ही बड़े प्रचण्ड हैं। वह अपने दुस्सह बाणोंसे मुझे बींध रहा है। महानुभावे! तुम आत्मदान देकर मेरे उस कामको शान्त करो
prītisaṃyogayuktābhir addhiḥ prahlādayasva me | puṣpāyudha durādharṣa pracaṇḍaśarakārmukam ||
ପ୍ରୀତିମୟ ସଂଯୋଗର ସୁଖରେ ମୋତେ ପ୍ରହ୍ଲାଦିତ କର। ପୁଷ୍ପାୟୁଧ କାମଦେବ ଦୁରାଧର୍ଷ ହୋଇଉଠିଛି; ତାଙ୍କର ଧନୁ ଓ ବାଣ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରଚଣ୍ଡ।
गन्धर्व उवाच