संवरणस्य पतनं, सचिवोपचारः, वसिष्ठस्य सूर्योपगमनम्
Saṃvaraṇa’s Collapse, Ministerial Aid, and Vasiṣṭha’s Approach to Sūrya
इह विप्रस्य भवने वयं पुत्र सुखोषिता: । अज्ञाता धार्रराष्ट्राणां सत्कृता वीतमन्यव:,बेटा! हमलोग यहाँ इस ब्राह्मणके घरमें बड़े सुखसे रहे हैं। धृतराष्ट्रके पुत्रोंको हमारी कानों-कान खबर नहीं होने पायी है। इस घरमें हमारा इतना सत्कार हुआ है कि हमने अपने पिछले दुःख और क्रोधको भुला दिया है। पार्थ! ब्राह्मणके इस उपकारसे उऋण होनेका यही एक उपाय मुझे दिखायी दिया। मनुष्य वही है, जिसके प्रति किया हुआ उपकार नष्ट न हो (जो उपकारको भुला न दे)
iha viprasya bhavane vayaṁ putrāḥ sukhoṣitāḥ | ajñātā dhārtarāṣṭrāṇāṁ satkṛtā vītamanyavaḥ ||
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଭାଇ, ଆମେ ଏଠାରେ ଏହି ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ଘରେ ବହୁ ସୁଖରେ ରହିଛୁ। ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁଅମାନେ ଆମ ବିଷୟରେ କିଛିମାତ୍ର ଜାଣିପାରିନାହାନ୍ତି। ଏହି ଘରେ ଆମକୁ ଏମିତି ସତ୍କାର ମିଳିଛି ଯେ ପୂର୍ବର ଦୁଃଖ ଓ କ୍ରୋଧ ଶାନ୍ତ ହୋଇଯାଇଛି।
युधिछिर उवाच