Hiḍimba’s Approach and Hiḍimbā’s Warning to Bhīmasena (हिडिम्बागमनम् / हिडिम्बा-भयवचनम्)
शपथेनाप्यरिं हन्यादर्थदानेन वा पुनः । विषेण मायया वापि नोपेक्षेत कथंचन । उभौ चेत् संशयोपेतौ श्रद्धावांस्तत्र वर्द्धते,सौगंध खाकर, धन अथवा जहर देकर या धोखेसे भी शत्रुको मार डाले। किसी तरह भी उसकी उपेक्षा न करे। यदि दोनों राजा समानरूपसे विजयके लिये यत्नशील हों और उनकी जीत संदेहास्पद जान पड़ती हो तो उनमें भी जो मेरे इस नीतिपूर्ण कथनपर श्रद्धा- विश्वास रखता है, वही उन्नतिको प्राप्त होता है
śapathenāpy ariṃ hanyād arthadānena vā punaḥ | viṣeṇa māyayā vāpi nopekṣeta kathaṃcana | ubhau cet saṃśayopetau śraddhāvāṃs tatra varddhate ||
ଶପଥକୁ ମଧ୍ୟ ଉପାୟ କରି, କିମ୍ବା ଧନ ଦେଇ, ବିଷ ଦ୍ୱାରା ଅଥବା ମାୟା-ଛଳରେ ଶତ୍ରୁକୁ ହତ କର; କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ତାକୁ ଅବହେଳା କରନି। ଯଦି ଦୁଇ ରାଜା ଜୟ ପାଇଁ ସମାନ ଭାବେ ଯତ୍ନଶୀଳ ହୋଇ ଫଳ ଅନିଶ୍ଚିତ ଲାଗେ, ତେବେ ଏହି ନୀତିଯୁକ୍ତ ଉପଦେଶରେ ଯାହାର ଶ୍ରଦ୍ଧା, ସେଇ ଉନ୍ନତି ପାଏ।
कणिक उवाच