Vāraṇāvatāgamana: Public Farewell, Vidura’s Coded Counsel, and Departure
ग्राह: पञ्चत्वमापेदे जड्घां त्यक्त्वा महात्मन: । अथाब्रवीन्महात्मानं भारद्वाजो महारथम्,परंतु दूसरे राजकुमार हक््के-बक्के-से होकर अपने-अपने स्थानपर ही खड़े रह गये। अर्जुनको तत्काल कार्यमें तत्पर देख द्रोणाचार्यने उन्हें अपने सब शिष्योंसे बढ़कर माना और उस समय वे उनपर बहुत प्रसन्न हुए। अर्जुनके बाणोंसे ग्राहके टुकड़े-टुकड़े हो गये और वह महात्मा द्रोणकी पिंडली छोड़कर मर गया। तब द्रोणाचार्यने महारथी महात्मा अर्जुनसे कहा--
grāhaḥ pañcatvam āpede jaṅghāṁ tyaktvā mahātmanaḥ | athābravīn mahātmānaṁ bhāradvājo mahāratham ||
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେ ଗ୍ରାହ ମହାତ୍ମାଙ୍କ ଜଙ୍ଘା ଛାଡ଼ି ପଞ୍ଚତ୍ୱକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେଲା। ତାପରେ ଭାରଦ୍ୱାଜପୁତ୍ର ଦ୍ରୋଣ, ଯିଏ ନିଜେ ମହାରଥୀ, ସେଇ ମହାତ୍ମା ମହାରଥୀଙ୍କୁ (ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ) ସମ୍ବୋଧନ କରି କହିଲେ।
वैशम्पायन उवाच