Kuntī’s Appeal for Progeny and the Vyuṣitāśva–Bhadrā Precedent (कुन्ती-पाण्डु संवादः; व्युषिताश्व-भद्रा आख्यानम्)
सम्प्राप्य नगर राजा पाण्डु: कौरवनन्दन: । न्यवेशयत तां भार्या कुन्तीं स्वभवने प्रभु:,राजेन्द्र! महाराज कुन्तिभोजने कुन्ती और पाण्डुका विवाहसंस्कार सम्पन्न करके उस समय उन्हें नाना प्रकारके धन और रत्नोंद्वारा सम्मानित किया। तत्पश्चात् पाण्डुको उनकी राजधानीमें भेज दिया। कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! तब कौरवनन्दन राजा पाण्डु नाना प्रकारकी ध्वजापताकाओंसे सुशोभित विशाल सेनाके साथ चले। उस समय बहुत-से ब्राह्मण एवं महर्षि आशीर्वाद देते हुए उनकी स्तुति करवाते थे। हस्तिनापुरमें आकर उन शक्तिशाली नरेशने अपनी प्यारी पत्नी कुन्तीको राजमहलमें पहुँचा दिया
samprāpya nagara rājā pāṇḍuḥ kauravanandanaḥ | nyaveśayat tāṃ bhāryāṃ kuntīṃ svabhavane prabhuḥ ||
ନଗରକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୋଇ କୁରୁନନ୍ଦନ ରାଜା ପାଣ୍ଡୁ ନିଜ ରାଜଭବନରେ ନିଜ ପତ୍ନୀ କୁନ୍ତୀଙ୍କୁ ବିଧିପୂର୍ବକ ସ୍ଥାପିତ କଲେ।
वैशम्पायन उवाच