Akrūra’s Journey to Vraja and His Devotional Vision of Kṛṣṇa and Balarāma
ददर्श कृष्णं रामं च व्रजे गोदोहनं गतौ । पीतनीलाम्बरधरौ शरदम्बुरुहेक्षणौ ॥ २८ ॥ किशोरौ श्यामलश्वेतौ श्रीनिकेतौ बृहद्भुजौ । सुमुखौ सुन्दरवरौ बलद्विरदविक्रमौ ॥ २९ ॥ ध्वजवज्राङ्कुशाम्भोजैश्चिह्नितैरङ्घ्रिभिर्व्रजम् । शोभयन्तौ महात्मानौ सानुक्रोशस्मितेक्षणौ ॥ ३० ॥ उदाररुचिरक्रीडौ स्रग्विणौ वनमालिनौ । पुण्यगन्धानुलिप्ताङ्गौ स्नातौ विरजवाससौ ॥ ३१ ॥ प्रधानपुरुषावाद्यौ जगद्धेतू जगत्पती । अवतीर्णौ जगत्यर्थे स्वांशेन बलकेशवौ ॥ ३२ ॥ दिशो वितिमिरा राजन्कुर्वाणौ प्रभया स्वया । यथा मारकत: शैलो रौप्यश्च कनकाचितौ ॥ ३३ ॥
dadarśa kṛṣṇaṁ rāmaṁ ca vraje go-dohanaṁ gatau pīta-nīlāmbara-dharau śarad-amburahekṣaṇau
ସେଇ ଦୁଇ ପ୍ରଭୁଙ୍କର ଲୀଳା ଉଦାର ଓ ରୁଚିର ଥିଲା। ସେମାନେ ପୁଷ୍ପମାଳା ଓ ବନମାଳାରେ ଶୋଭିତ, ପୁଣ୍ୟସୁଗନ୍ଧ ଦ୍ରବ୍ୟରେ ଲେପିତ, ସ୍ନାତ ଓ ନିର୍ମଳ ବସ୍ତ୍ରଧାରୀ ଥିଲେ। ଅକ୍ରୂର ସେମାନଙ୍କୁ ରତ୍ନହାରରେ ଅଲଙ୍କୃତ ଦେଖିଲେ।