Bala KandaPrakarana 3328 Verses

Prakarana 33

सोपान-प्रवेश: ‘भक्ति का जन्म’ से ‘भक्ति का समाज’ तक। बालकाण्ड में राम-नाम और राम-रूप का प्रथम स्थापन होता है; यहाँ विवाह-लीला ‘सगुण’ की साकार मधुरता के द्वारा जीव को ‘निरगुण’ सत्य की ओर उन्मुख करती है—लोक-रीति (वैदिक/लौकिक) के अनुशासन में प्रेम का शुद्धीकरण। यह चरण साधक को बताता है कि मुक्ति का द्वार ‘मंगल-आचार’ और ‘समधी-भाव’ (समता, आदर, विनय) से खुलता है।

यह प्रकरण ‘सोपान-प्रवेश’ का जीवंत रूपक है: (1) वैदिक+लौकिक रीति = साधना का अनुशासन; प्रेम को मर्यादा में ढालकर शुद्ध करना। (2) पाद-प्रक्षालन/मधुपर्क/होम/पाणिग्रहण/भावँरी = इन्द्रिय-आनन्द का शोधन, अहं का नम्रकरण, और संबंधों का देवत्व-आरोप। (3) जनक–दशरथ की समधी-समता = सामाजिक-भक्ति का आदर्श; सत्ता नहीं, विनय-समता से ‘मंगल’ प्रकट होता है। (4) देव-पुष्पवृष्टि और मुनि-आशीष = यह संकेत कि जब लोकाचार धर्माचार बनता है, तब प्रकृति/देवता भी अनुकूल हो जाते हैं। (5) सगुण-विवाह-रस का अंतिम संकेत निर्गुण-सिद्धान्त की ओर: जो ‘मनोज-अरि’ (काम-विजयी) हैं, वही ‘कलिमल-भंजन’—रूप-रस के भीतर सत्य का शान्त प्रकाश।

Verses

Verse 667 (चौपाई)

मिले जनकु दसरथु अति प्रीतीं। करि बैदिक लौकिक सब रीतीं।। मिलत महा दोउ राज बिराजे। उपमा खोजि खोजि कबि लाजे।। लही न कतहुँ हारि हियँ मानी। इन्ह सम एइ उपमा उर आनी।। सामध देखि देव अनुरागे। सुमन बरषि जसु गावन लागे।। जगु बिरंचि उपजावा जब तें। देखे सुने ब्याह बहु तब तें।। सकल भाँति सम साजु समाजू। सम समधी देखे हम आजू।। देव गिरा सुनि सुंदर साँची। प्रीति अलौकिक दुहु दिसि माची।। देत पाँवड़े अरघु सुहाए। सादर जनकु मंडपहिं ल्याए।।

Verse 668 (छंद)

मंडपु बिलोकि बिचीत्र रचनाँ रुचिरताँ मुनि मन हरे।। निज पानि जनक सुजान सब कहुँ आनि सिंघासन धरे।। कुल इष्ट सरिस बसिष्ट पूजे बिनय करि आसिष लही। कौसिकहि पूजत परम प्रीति कि रीति तौ न परै कही।।

Verse 669 (दोहा/सोरठा)

बामदेव आदिक रिषय पूजे मुदित महीस। दिए दिब्य आसन सबहि सब सन लही असीस।।320।।

Verse 670 (चौपाई)

बहुरि कीन्ह कोसलपति पूजा। जानि ईस सम भाउ न दूजा।। कीन्ह जोरि कर बिनय बड़ाई। कहि निज भाग्य बिभव बहुताई।। पूजे भूपति सकल बराती। समधि सम सादर सब भाँती।। आसन उचित दिए सब काहू। कहौं काह मूख एक उछाहू।। सकल बरात जनक सनमानी। दान मान बिनती बर बानी।। बिधि हरि हरु दिसिपति दिनराऊ। जे जानहिं रघुबीर प्रभाऊ।। कपट बिप्र बर बेष बनाएँ। कौतुक देखहिं अति सचु पाएँ।। पूजे जनक देव सम जानें। दिए सुआसन बिनु पहिचानें।।

Verse 671 (छंद)

पहिचान को केहि जान सबहिं अपान सुधि भोरी भई। आनंद कंदु बिलोकि दूलहु उभय दिसि आनँद मई।। सुर लखे राम सुजान पूजे मानसिक आसन दए। अवलोकि सीलु सुभाउ प्रभु को बिबुध मन प्रमुदित भए।।

Verse 672 (दोहा/सोरठा)

रामचंद्र मुख चंद्र छबि लोचन चारु चकोर। करत पान सादर सकल प्रेमु प्रमोदु न थोर।।321।।

Verse 673 (चौपाई)

समउ बिलोकि बसिष्ठ बोलाए। सादर सतानंदु सुनि आए।। बेगि कुअँरि अब आनहु जाई। चले मुदित मुनि आयसु पाई।। रानी सुनि उपरोहित बानी। प्रमुदित सखिन्ह समेत सयानी।। बिप्र बधू कुलबृद्ध बोलाईं। करि कुल रीति सुमंगल गाईं।। नारि बेष जे सुर बर बामा। सकल सुभायँ सुंदरी स्यामा।। तिन्हहि देखि सुखु पावहिं नारीं। बिनु पहिचानि प्रानहु ते प्यारीं।। बार बार सनमानहिं रानी। उमा रमा सारद सम जानी।। सीय सँवारि समाजु बनाई। मुदित मंडपहिं चलीं लवाई।।

Verse 674 (छंद)

चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं। नवसप्त साजें सुंदरी सब मत्त कुंजर गामिनीं।। कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल लाजहीं। मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गती बर बाजहीं।।

Verse 675 (दोहा/सोरठा)

सोहति बनिता बृंद महुँ सहज सुहावनि सीय। छबि ललना गन मध्य जनु सुषमा तिय कमनीय।।322।।

Verse 676 (चौपाई)

सिय सुंदरता बरनि न जाई। लघु मति बहुत मनोहरताई।। आवत दीखि बरातिन्ह सीता।।रूप रासि सब भाँति पुनीता।। सबहि मनहिं मन किए प्रनामा। देखि राम भए पूरनकामा।। हरषे दसरथ सुतन्ह समेता। कहि न जाइ उर आनँदु जेता।। सुर प्रनामु करि बरसहिं फूला। मुनि असीस धुनि मंगल मूला।। गान निसान कोलाहलु भारी। प्रेम प्रमोद मगन नर नारी।। एहि बिधि सीय मंडपहिं आई। प्रमुदित सांति पढ़हिं मुनिराई।। तेहि अवसर कर बिधि ब्यवहारू। दुहुँ कुलगुर सब कीन्ह अचारू।।

Verse 677 (छंद)

आचारु करि गुर गौरि गनपति मुदित बिप्र पुजावहीं। सुर प्रगटि पूजा लेहिं देहिं असीस अति सुखु पावहीं।। मधुपर्क मंगल द्रब्य जो जेहि समय मुनि मन महुँ चहैं। भरे कनक कोपर कलस सो सब लिएहिं परिचारक रहैं।।1।। कुल रीति प्रीति समेत रबि कहि देत सबु सादर कियो। एहि भाँति देव पुजाइ सीतहि सुभग सिंघासनु दियो।। सिय राम अवलोकनि परसपर प्रेम काहु न लखि परै।। मन बुद्धि बर बानी अगोचर प्रगट कबि कैसें करै।।2।।

Verse 678 (दोहा/सोरठा)

होम समय तनु धरि अनलु अति सुख आहुति लेहिं। बिप्र बेष धरि बेद सब कहि बिबाह बिधि देहिं।।323।।

Verse 679 (चौपाई)

जनक पाटमहिषी जग जानी। सीय मातु किमि जाइ बखानी।। सुजसु सुकृत सुख सुदंरताई। सब समेटि बिधि रची बनाई।। समउ जानि मुनिबरन्ह बोलाई। सुनत सुआसिनि सादर ल्याई।। जनक बाम दिसि सोह सुनयना। हिमगिरि संग बनि जनु मयना।। कनक कलस मनि कोपर रूरे। सुचि सुंगध मंगल जल पूरे।। निज कर मुदित रायँ अरु रानी। धरे राम के आगें आनी।। पढ़हिं बेद मुनि मंगल बानी। गगन सुमन झरि अवसरु जानी।। बरु बिलोकि दंपति अनुरागे। पाय पुनीत पखारन लागे।।

Verse 680 (छंद)

लागे पखारन पाय पंकज प्रेम तन पुलकावली। नभ नगर गान निसान जय धुनि उमगि जनु चहुँ दिसि चली।। जे पद सरोज मनोज अरि उर सर सदैव बिराजहीं। जे सकृत सुमिरत बिमलता मन सकल कलि मल भाजहीं।।1।। जे परसि मुनिबनिता लही गति रही जो पातकमई। मकरंदु जिन्ह को संभु सिर सुचिता अवधि सुर बरनई।। करि मधुप मन मुनि जोगिजन जे सेइ अभिमत गति लहैं। ते पद पखारत भाग्यभाजनु जनकु जय जय सब कहै।।2।। बर कुअँरि करतल जोरि साखोचारु दोउ कुलगुर करैं। भयो पानिगहनु बिलोकि बिधि सुर मनुज मुनि आँनद भरैं।। सुखमूल दूलहु देखि दंपति पुलक तन हुलस्यो हियो। करि लोक बेद बिधानु कन्यादानु नृपभूषन कियो।।3।। हिमवंत जिमि गिरिजा महेसहि हरिहि श्री सागर दई। तिमि जनक रामहि सिय समरपी बिस्व कल कीरति नई।। क्यों करै बिनय बिदेहु कियो बिदेहु मूरति सावँरी। करि होम बिधिवत गाँठि जोरी होन लागी भावँरी।।4।।

Verse 681 (दोहा/सोरठा)

जय धुनि बंदी बेद धुनि मंगल गान निसान। सुनि हरषहिं बरषहिं बिबुध सुरतरु सुमन सुजान।।324।।

Verse 682 (चौपाई)

कुअँरु कुअँरि कल भावँरि देहीं।।नयन लाभु सब सादर लेहीं।। जाइ न बरनि मनोहर जोरी। जो उपमा कछु कहौं सो थोरी।। राम सीय सुंदर प्रतिछाहीं। जगमगात मनि खंभन माहीं । मनहुँ मदन रति धरि बहु रूपा। देखत राम बिआहु अनूपा।। दरस लालसा सकुच न थोरी। प्रगटत दुरत बहोरि बहोरी।। भए मगन सब देखनिहारे। जनक समान अपान बिसारे।। प्रमुदित मुनिन्ह भावँरी फेरी। नेगसहित सब रीति निबेरीं।। राम सीय सिर सेंदुर देहीं। सोभा कहि न जाति बिधि केहीं।। अरुन पराग जलजु भरि नीकें। ससिहि भूष अहि लोभ अमी कें।। बहुरि बसिष्ठ दीन्ह अनुसासन। बरु दुलहिनि बैठे एक आसन।।

Verse 683 (छंद)

बैठे बरासन रामु जानकि मुदित मन दसरथु भए। तनु पुलक पुनि पुनि देखि अपनें सुकृत सुरतरु फल नए।। भरि भुवन रहा उछाहु राम बिबाहु भा सबहीं कहा। केहि भाँति बरनि सिरात रसना एक यहु मंगलु महा।।1।। तब जनक पाइ बसिष्ठ आयसु ब्याह साज सँवारि कै। माँडवी श्रुतिकीरति उरमिला कुअँरि लईं हँकारि के।। कुसकेतु कन्या प्रथम जो गुन सील सुख सोभामई। सब रीति प्रीति समेत करि सो ब्याहि नृप भरतहि दई।।2।। जानकी लघु भगिनी सकल सुंदरि सिरोमनि जानि कै। सो तनय दीन्ही ब्याहि लखनहि सकल बिधि सनमानि कै।। जेहि नामु श्रुतकीरति सुलोचनि सुमुखि सब गुन आगरी। सो दई रिपुसूदनहि भूपति रूप सील उजागरी।।3।। अनुरुप बर दुलहिनि परस्पर लखि सकुच हियँ हरषहीं। सब मुदित सुंदरता सराहहिं सुमन सुर गन बरषहीं।। सुंदरी सुंदर बरन्ह सह सब एक मंडप राजहीं। जनु जीव उर चारिउ अवस्था बिमुन सहित बिराजहीं।।4।।

Verse 684 (दोहा/सोरठा)

मुदित अवधपति सकल सुत बधुन्ह समेत निहारि। जनु पार महिपाल मनि क्रियन्ह सहित फल चारि।।325।।

Verse 685 (चौपाई)

जसि रघुबीर ब्याह बिधि बरनी। सकल कुअँर ब्याहे तेहिं करनी।। कहि न जाइ कछु दाइज भूरी। रहा कनक मनि मंडपु पूरी।। कंबल बसन बिचित्र पटोरे। भाँति भाँति बहु मोल न थोरे।। गज रथ तुरग दास अरु दासी। धेनु अलंकृत कामदुहा सी।। बस्तु अनेक करिअ किमि लेखा। कहि न जाइ जानहिं जिन्ह देखा।। लोकपाल अवलोकि सिहाने। लीन्ह अवधपति सबु सुखु माने।। दीन्ह जाचकन्हि जो जेहि भावा। उबरा सो जनवासेहिं आवा।। तब कर जोरि जनकु मृदु बानी। बोले सब बरात सनमानी।।

Verse 686 (छंद)

सनमानि सकल बरात आदर दान बिनय बड़ाइ कै। प्रमुदित महा मुनि बृंद बंदे पूजि प्रेम लड़ाइ कै।। सिरु नाइ देव मनाइ सब सन कहत कर संपुट किएँ। सुर साधु चाहत भाउ सिंधु कि तोष जल अंजलि दिएँ।।1।। कर जोरि जनकु बहोरि बंधु समेत कोसलराय सों। बोले मनोहर बयन सानि सनेह सील सुभाय सों।। संबंध राजन रावरें हम बड़े अब सब बिधि भए। एहि राज साज समेत सेवक जानिबे बिनु गथ लए।।2।। ए दारिका परिचारिका करि पालिबीं करुना नई। अपराधु छमिबो बोलि पठए बहुत हौं ढीट्यो कई।। पुनि भानुकुलभूषन सकल सनमान निधि समधी किए। कहि जाति नहिं बिनती परस्पर प्रेम परिपूरन हिए।।3।। बृंदारका गन सुमन बरिसहिं राउ जनवासेहि चले। दुंदुभी जय धुनि बेद धुनि नभ नगर कौतूहल भले।। तब सखीं मंगल गान करत मुनीस आयसु पाइ कै। दूलह दुलहिनिन्ह सहित सुंदरि चलीं कोहबर ल्याइ कै।।4।।

Verse 687 (दोहा/सोरठा)

पुनि पुनि रामहि चितव सिय सकुचति मनु सकुचै न। हरत मनोहर मीन छबि प्रेम पिआसे नैन।।326।।

Verse 688 (चौपाई)

स्याम सरीरु सुभायँ सुहावन। सोभा कोटि मनोज लजावन।। जावक जुत पद कमल सुहाए। मुनि मन मधुप रहत जिन्ह छाए।। पीत पुनीत मनोहर धोती। हरति बाल रबि दामिनि जोती।। कल किंकिनि कटि सूत्र मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर।। पीत जनेउ महाछबि देई। कर मुद्रिका चोरि चितु लेई।। सोहत ब्याह साज सब साजे। उर आयत उरभूषन राजे।। पिअर उपरना काखासोती। दुहुँ आँचरन्हि लगे मनि मोती।। नयन कमल कल कुंडल काना। बदनु सकल सौंदर्ज निधाना।। सुंदर भृकुटि मनोहर नासा। भाल तिलकु रुचिरता निवासा।। सोहत मौरु मनोहर माथे। मंगलमय मुकुता मनि गाथे।।

Verse 689 (छंद)

गाथे महामनि मौर मंजुल अंग सब चित चोरहीं। पुर नारि सुर सुंदरीं बरहि बिलोकि सब तिन तोरहीं।। मनि बसन भूषन वारि आरति करहिं मंगल गावहिं। सुर सुमन बरिसहिं सूत मागध बंदि सुजसु सुनावहीं।।1।। कोहबरहिं आने कुँअर कुँअरि सुआसिनिन्ह सुख पाइ कै। अति प्रीति लौकिक रीति लागीं करन मंगल गाइ कै।। लहकौरि गौरि सिखाव रामहि सीय सन सारद कहैं। रनिवासु हास बिलास रस बस जन्म को फलु सब लहैं।।2।। निज पानि मनि महुँ देखिअति मूरति सुरूपनिधान की। चालति न भुजबल्ली बिलोकनि बिरह भय बस जानकी।। कौतुक बिनोद प्रमोदु प्रेमु न जाइ कहि जानहिं अलीं। बर कुअँरि सुंदर सकल सखीं लवाइ जनवासेहि चलीं।।3।। तेहि समय सुनिअ असीस जहँ तहँ नगर नभ आनँदु महा। चिरु जिअहुँ जोरीं चारु चारयो मुदित मन सबहीं कहा।। जोगीन्द्र सिद्ध मुनीस देव बिलोकि प्रभु दुंदुभि हनी। चले हरषि बरषि प्रसून निज निज लोक जय जय जय भनी।।4।।

Verse 690 (दोहा/सोरठा)

सहित बधूटिन्ह कुअँर सब तब आए पितु पास। सोभा मंगल मोद भरि उमगेउ जनु जनवास।।327।।

Verse 691 (चौपाई)

पुनि जेवनार भई बहु भाँती। पठए जनक बोलाइ बराती।। परत पाँवड़े बसन अनूपा। सुतन्ह समेत गवन कियो भूपा।। सादर सबके पाय पखारे। जथाजोगु पीढ़न्ह बैठारे।। धोए जनक अवधपति चरना। सीलु सनेहु जाइ नहिं बरना।। बहुरि राम पद पंकज धोए। जे हर हृदय कमल महुँ गोए।। तीनिउ भाई राम सम जानी। धोए चरन जनक निज पानी।। आसन उचित सबहि नृप दीन्हे। बोलि सूपकारी सब लीन्हे।। सादर लगे परन पनवारे। कनक कील मनि पान सँवारे।।

Verse 692 (दोहा/सोरठा)

सूपोदन सुरभी सरपि सुंदर स्वादु पुनीत। छन महुँ सब कें परुसि गे चतुर सुआर बिनीत।।328।।

Verse 693 (चौपाई)

पंच कवल करि जेवन लअगे। गारि गान सुनि अति अनुरागे।। भाँति अनेक परे पकवाने। सुधा सरिस नहिं जाहिं बखाने।। परुसन लगे सुआर सुजाना। बिंजन बिबिध नाम को जाना।। चारि भाँति भोजन बिधि गाई। एक एक बिधि बरनि न जाई।। छरस रुचिर बिंजन बहु जाती। एक एक रस अगनित भाँती।। जेवँत देहिं मधुर धुनि गारी। लै लै नाम पुरुष अरु नारी।। समय सुहावनि गारि बिराजा। हँसत राउ सुनि सहित समाजा।। एहि बिधि सबहीं भौजनु कीन्हा। आदर सहित आचमनु दीन्हा।।

Verse 694 (दोहा/सोरठा)

देइ पान पूजे जनक दसरथु सहित समाज। जनवासेहि गवने मुदित सकल भूप सिरताज।।329।।

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