Uttarā-Pratigrahaṇa and Abhimanyu–Uttarā Vivāha
Virāṭa-parva, Adhyāya 67
अजुन उवाच अनाथान् दुःखितान् दीनान् कृशान् वृद्धान् पराजितान् | न्यस्तशस्त्रान् निराशांश्व नाहं हन्मि कृताञज्जलीन् ।।) स्वस्ति व्रजत वो भद्गरे न भेतव्यं कथंचन । नाहमार्तान् जिघांसामि भृशमाश्वासयामि व:,क्षुत्पिपासापरिश्रान्ता विदेशस्था विचेतस: । जब कौरव-दलके लोग चले गये या इधर-उधर सब दिशाओंमें भाग गये, उस समय बहुत-से कौरवसैनिक जो घने जंगलमें छिपे हुए थे, वहाँसे निकलकर डरते-डरते अर्जुनके पास आये। उनके मनमें भय समा गया था। वे भूखे-प्यासे और थके-माँदे थे। परदेशमें होनेके कारण उनके हृदयकी व्याकुलता और बढ़ गयी थी। वे उस समय केश खोले और हाथ जोड़े हुए खड़े दिखायी दिये अर्जुनने कहा--सैनिको! जो लोग अनाथ, दु:खी, दीन, दुर्बल, वृद्ध, पराजित, अस्त्र- शस्त्रोंको नीचे डाल देनेवाले, प्राणोंसे निराश एवं हाथ जोड़कर शरणागत होते हैं, उन सबको मैं नहीं मारता हूँ। तुम्हारा भला हो। तुम कुशलपूर्वक घर लौट जाओ। तुम्हें मेरी ओरसे किसी प्रकारका भय नहीं होना चाहिये। मैं संकटमें पड़े हुए मनुष्योंको नहीं मारना चाहता। इस बातके लिये मैं तुम्हें पूरा-पूरा विश्वास दिलाता हूँ
arjuna uvāca—anāthān duḥkhitān dīnān kṛśān vṛddhān parājitān | nyastaśastrān nirāśāṁś ca nāhaṁ hanmi kṛtāñjalīn || svasti vrajata vo bhadre na bhetavyaṁ kathaṁcana | nāham ārtān jighāṁsāmi bhṛśam āśvāsayāmi vaḥ || kṣutpipāsāpariśrāntā videśasthā viceṭasaḥ |
အာဂျုန မိန့်တော်မူ၏— “စစ်သည်တို့၊ အကာအကွယ်မဲ့သူ၊ ဒုက္ခရောက်သူ၊ ဆင်းရဲသူ၊ အားနည်းသူ၊ အိုမင်းသူ၊ အနိုင်ရှုံးပြီးသားသူတို့ကို—လက်နက်ချထားသူ၊ အသက်ရှင်မည်ဟု မျှော်လင့်ချက်ပျောက်သူ၊ လက်အုပ်ချီ၍ အလျှော့ပေးဝင်ရောက်လာသူတို့ကို—ငါ မသတ်။ ကောင်းကျိုးဖြစ်ပါစေ။ အန္တရာယ်ကင်းစွာ အိမ်သို့ ပြန်သွားကြ။ ငါ့ဘက်မှ မည်သို့မျှ မကြောက်ရ။ ဒုက္ခရောက်နေသူတို့ကို ငါ မသတ်လို။ ဤအကြောင်းကို ငါ သင်တို့အား အပြည့်အဝ အာမခံပေး၏။”
वैशम्पायन उवाच