Vyāsa’s Counsel to Dhṛtarāṣṭra on Restraining Duryodhana (व्यास-धृतराष्ट्र-उपदेशः)
अपरोअप्यबलप्राण: कृशो धमनिसंततः । कृच्छादुद्गहते भारं तं वै शोचामि वासव,सुरेश्वर! वह तो विश्रामके लिये उत्सुक होकर बैठ रहा है और वह किसान उसे डंडे मारता है। देवेन्द्र! यह देखकर मुझे अपने बच्चेके प्रति बड़ी दया हो आयी है और मेरा मन उद्विग्न हो उठा है। वहाँ दो बैलोंमेंसे एक तो बलवान है जो भारयुक्त जूएको खींच सकता है; परंतु दूसरा निर्बल है, प्राणशून्य-सा जान पड़ता है। वह इतना दुबला-पतला हो गया है कि उसके सारे शरीरमें फैली हुई नाड़ियाँ दीख रही हैं। वह बड़े कष्टसे उस भारयुक्त जूएको खींच पाता हैं। वासव! मुझे उसीके लिये शोक हो रहा है। इन्द्र! देखो-देखो, चाबुकसे मार- मारकर उसे बार-बार पीड़ा दी जा रही है, तो भी उस जूएके भारको वहन करनेमें वह असमर्थ हो रहा है
aparo 'py abalaprāṇaḥ kṛśo dhamanisaṃtataḥ | kṛcchrād udguhate bhāraṃ taṃ vai śocāmi vāsava ||
ဗျာသက ဆိုသည်– «အခြားနွားတစ်ကောင်လည်း အားနည်းပြီး အသက်မဲ့သလိုပဲ။ အလွန်ပိန်လှီသွားလို့ ကိုယ်တစ်လျှောက် သွေးကြောတွေ ထင်ထင်ရှားရှား ပေါ်နေတယ်။ အလွန်ခက်ခဲစွာနဲ့ပဲ အလေးကို ဆွဲနိုင်တယ်။ ဝါသဝ (အိန္ဒြာ) ရေ—ငါက သူ့အတွက်ပဲ ဝမ်းနည်းနေတယ်»။
व्यास उवाच