Sāvitrī–Satyavān Vivāha: Kanyāpradāna and Āśrama-Śīla (सावित्री-सत्यवान्विवाहः)
एवमादीनि वाक्यानि श्रुत्वा तस्याथ जानकी । पिधाय कर्णो सुश्रोणी मैवमित्यब्रवीद् वच:,रावणके ऐसे वचन सुनकर सुन्दरी जनककिशोरीने अपने दोनों कान बंद कर लिये और उससे इस प्रकार कहा--“बस, अब ऐसी बातें मुँहसे न निकाल। नक्षत्रोंसहित आकाश फट पड़े, पृथ्वी टूक-टूक हो जाय और अग्नि अपनी उष्णताका त्याग करके शीतल हो जाय, परंतु मैं रघुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजीको नहीं छोड़ सकती
evamādīni vākyāni śrutvā tasyātha jānakī | pidhāya karṇau suśroṇī maivam ity abravīd vacaḥ ||
မာရကဏ္ဍေယက ပြောသည်– ထိုသူ၏စကားများကို ကြားသော် ဇာနကီ (စီတာ) ဟူသော ခါးလှသောမိန်းမသည် နားနှစ်ဖက်ကို ပိတ်ကာ «ဤသို့ မပြောနှင့်» ဟု ပြန်ဆို하였다။
मार्कण्डेय उवाच