उद्योगपर्व — अध्याय 33: धृतराष्ट्र-विदुर संवादः (विदुरनीतिः)
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६ श्लोक मिलाकर कुल १२९ “लोक हैं।] हि. 770 8 2 बक। न मा * इस ३३ वें अध्यायसे प्रारम्भ होकर ४० वें अध्यायतक “विदुरनीति' है। > यहाँ 'उपास्ते” के स्थानपर “उपासते” यह प्रयोग आर्ष समझना चाहिये। - मुहूर्त शब्दका अर्थ दो घड़ी होता है। एक घड़ी २४ मिनटकी मानी जाती है। चतुस्त्रिं5 ध्याय: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीके नीतियुक्त वचन धृतराष्ट उवाच जाग्रतो दहयमानस्य यत् कार्यमनुपश्यसि । तद् ब्रूहि त्वं हि नस्तात धर्मार्थकुशलो हासि,धृतराष्ट्र बोले--तात! मैं चिन्तासे जलता हुआ अभीतक जाग रहा हूँ; तुम मेरे करनेयोग्य जो कार्य समझो, उसे बताओ; क्योंकि हमलोगोंमें तुम्हीं धर्म और अर्थके ज्ञानमें निपुण हो
dhṛtarāṣṭra uvāca | jāgrato dahyamānasya yat kāryam anupaśyasi | tad brūhi tvaṃ hi nas tāta dharmārthakuśalo hy asi ||
ဓೃತရာෂ္ဋ္ရက ပြော၏— «အဖေတော်၊ ငါသည် စိုးရိမ်ပူပန်မှုကြောင့် မီးလောင်သကဲ့သို့ ဖြစ်ကာ ယခုထိ နိုးနေခဲ့ရသည်။ သင်မြင်သည့်အတိုင်း လုပ်သင့်သော လမ်းစဉ်ကို ပြောပါ။ အကြောင်းမူကား ငါတို့အနက် သင်သည် ဓမ္မ (dharma) နှင့် အರ್ಥ (artha) ကို နားလည်ရာတွင် အမှန်တကယ် ကျွမ်းကျင်သူ ဖြစ်သည်။»
धृतराष्ट उवाच