Udyoga Parva Adhyāya 103: Garuḍa’s Protest, Viṣṇu’s Demonstration, and Counsel Toward Śama
ध्रुवं तथा तद् भविता जानीमस्तस्यथ निश्चयम् । तेन हर्ष: प्रणष्टो मे सुपर्णवचनेन वै,परंतु माननीय महामुने! कारणकी दुर्बलतासे मैं चिन्तामें पड़ा रहता हूँ। महाद्युते! इस बालकका पिता, जो मेरा पुत्र था, गरुड़का भोजन बन गया। इस दुःखसे हमलोग पीड़ित हैं। प्रभो! जब गरुड़ यहाँसे जाने लगे, तब पुनः यह कहते गये कि दूसरे महीनेमें मैं सुमुखको भी खा जाऊँगा। अवश्य ही ऐसा ही होगा; क्योंकि हम गरुड़के निश्चयको जानते हैं। गरुड़के उस कथनसे मेरी हँसी-खुशी नष्ट हो गयी है
dhruvaṃ tathā tad bhavitā jānīmas tasyātha niścayam | tena harṣaḥ praṇaṣṭo me suparṇavacanena vai ||
«အမှန်ပင် ထိုသို့ ဖြစ်လာမည်။ သူ၏ ဆုံးဖြတ်ချက်၏ သေချာတည်ကြည်မှုကို ကျွန်ုပ်တို့ သိကြသည်။ ထို့ကြောင့် စုပဏ္ဏ (ဂရုဍ) ၏ စကားကြောင့် ကျွန်ုပ်၏ ပျော်ရွှင်မှု ပျက်စီးသွားသည်။»
आर्यक उवाच