सभा-पर्व, अध्याय ६१ — द्रौपदी-प्रश्नः, सभाधर्मः, सत्यवचन-नियमः
मेरे पास हजारों निष्कोंसे- भरी हुई बहुत-सी सुन्दर पेटियाँ रखी हैं। इसके सिवा खजाना है, अक्षय धन है और अनेक प्रकारके सुवर्ण हैं। राजन! मेरा यह सब धन दाँवपर लगा दिया गया। मैं इसीके द्वारा तुम्हारे साथ खेलता हूँ ।। वैशम्पायन उवाच कौरवाणां कुलकरं ज्येष्ठं पाण्डवमच्युतम् । इत्युक्त: शकुनि: प्राह जितमित्येव त॑ नृपम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यह सुनकर मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले कौरवोंके वंशधर एवं पाण्डुके ज्येष्ठ पुत्र राजा युधिष्ठिससे शकुनिने फिर कहा--'लो, यह दाँव भी मैंने ही जीता”
vaiśampāyana uvāca | kauravāṇāṁ kulakaraṁ jyeṣṭhaṁ pāṇḍavam acyutam | ity uktaḥ śakuniḥ prāha jitam ity eva taṁ nṛpam ||
ဝိုင်ရှမ္ပာယနက ပြောသည်– ထိုသို့ မိန့်တော်မူပြီးနောက်၊ ကုရုဝంశ၏ ထင်ရှားသော မျိုးဆက်၊ ပဏ္ဍဝတို့၏ အကြီးဆုံး၊ သမာဓိနှင့် အကျင့်သိက္ခာမှ မလွဲမသွားသော ရာဇာ ယုဓိဋ္ဌိရအား ရှကူနိက တစ်ခွန်းတည်းဖြင့် ပြန်ဆို하였다– «အနိုင်—ဒီလည်း ငါအနိုင်ရသည်» ဟု။
वैशम्पायन उवाच