दुर्योधनस्य बलिवर्णनम् — Duryodhana’s Description of Tribute at the Rājasūya
इस प्रकार जब वह ऊपर चढ़ा, तब सब लोग उसकी भ्रान्तिपर हँसने लगे। उसके बाद राजा दुर्योधनने एक स्फटिकमणिका बना हुआ दरवाजा देखा, जो वास्तवमें बंद था, तो भी खुला दीखता था। उसमें प्रवेश करते ही उसका सिर टकरा गया और उसे चक््कर-सा आ गया ।। तादृशं च परं द्वारं स्फाटिकोरुकपाटकम् | विघटूटयन् कराभ्यां तु निष्क्रम्याग्रे पपात ह,ठीक उसी तरहका एक दूसरा दरवाजा मिला, जिसमें स्फटिकमणिके बड़े-बड़े किंवाड़ लगे थे। यद्यपि वह खुला था, तो भी दुर्योधनने उसे बंद समझकर उसपर दोनों हाथोंसे धक्का देना चाहा। किंतु धक्केसे वह स्वयं द्वारके बाहर निकलकर गिर पड़ा
tādṛśaṃ ca paraṃ dvāraṃ sphāṭikorukapāṭakam | vighaṭūṭayan karābhyāṃ tu niṣkramyāgre papāta ha ||
ဝိုင်ရှမ္ပါယနက ပြော၏—ထို့နောက် စဖာတိကပြားကြီးများ တပ်ဆင်ထားသော အလားတူတံခါးတစ်ခုကို ထပ်မံတွေ့၏။ အမှန်တကယ် ဖွင့်ထားသော်လည်း ပိတ်ထားသည်ဟု မှားယွင်းထင်ကာ ဒုရ്യೋಧနသည် လက်နှစ်ဖက်ဖြင့် အားဖြင့်တွန်းလိုက်ရာ၊ ထိုတွန်းအားကြောင့်ပင် သူကိုယ်တိုင် တံခါးမှ ထွက်လဲကျ၍ ရှေ့သို့ ပြုတ်ကျသွား၏။ ကြည့်ရှုသူတို့သည် သူ၏ မောဟကို ရယ်မောကြ၏။
वैशम्पायन उवाच