Aṣṭāvakra–Strī-saṃvāda: Dhṛti, hospitality, and a dispute on autonomy
ये स्त्रियाँ न पिताको जानती हैं न माताको, न कुलको समझती हैं न भाइयोंको। पति, पुत्र तथा देवरोंकी भी ये परवाह नहीं करती हैं। अपने लिये रतिकी इच्छा रखकर ये समस्त कुलकी मर्यादाका नाश कर डालती हैं, ठीक उसी तरह जैसे बड़ी-बड़ी नदियाँ अपने तटोंको ही तोड़-फोड़ देती हैं। इन सब दोषोंको समझकर ही प्रजापतिने स्त्रियोंके विषयमें उपर्युक्त बातें कही हैं ।। भीष्म उवाच ततः स ऋषिरेकाग्रस्तां स्त्रियं प्रत्यभाषत । आस्यतां रुचितश्छन्द: कि च कार्य ब्रवीहि मे,भीष्मजी कहते हैं--राजन! तब ऋषिने एकाग्रचित्त होकर उस स्त्रीसे कहा--“चुप रहो। मनमें भोगकी रुचि होनेपर स्वेच्छाचार होता है। मेरी रुचि नहीं है, अतः मुझसे यह काम नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त यदि मुझसे कोई काम हो तो बताओ'
bhīṣma uvāca | tataḥ sa ṛṣir ekāgrastāṃ striyaṃ pratyabhāṣata | āsyatāṃ rucitaś chandaḥ, kiṃ ca kāryaṃ bravīhi me |
ဘိဿမက ပြောသည်– ထို့နောက် ထိုရသီသည် စိတ်ကို တစ်ချက်တည်း စုစည်းထား၍ မိန်းမကို ပြော하였다– «တိတ်တိတ်နေပါ။ စိတ်က ပျော်ရွှင်မှုဘက်သို့ လိုလားလျှင် လူသည် ကိုယ်လိုရာဆန္ဒအတိုင်း ပြုမူတတ်၏။ ငါ့တွင် ထိုလိုလားမှု မရှိသဖြင့် ဤကိစ္စကို ငါ မလုပ်နိုင်။ အခြားလုပ်စရာ တစ်စုံတစ်ရာရှိလျှင် ငါ့ကို ပြောပါ»။
भीष्म उवाच