Śukra’s Ultimatum and Devayānī’s Demand (शुक्र-प्रतिज्ञा तथा देवयानी-वर-याचना)
अनुदर्श ततश्रक्रे प्रत्यगृह्नान्न चाप्पसौ | ततो महर्षिश्रि: क्रुद्ध: सद्य: शप्तो व्यनश्यत,धन्यं यशस्यमायुष्यं कीर्तयिष्यामि तेडनघ । वैशम्पायनजी कहते हैं--निष्पाप जनमेजय! अब मैं दक्ष प्रजापति, वैवस्वत मनु, भरत, कुरु, पूर, अजमीढ, यादव, कौरव तथा भरतवंशियोंकी कुल-परम्पराका तुमसे वर्णन करूँगा। उनका कुल परम पवित्र, महान् मंगलकारी तथा धन, यश और आयुकी प्राप्ति करानेवाला है जनमेजय! ब्रह्मतोकसे सनत्कुमारजीने आकर उन्हें बहुत समझाया और ब्राह्मणोंपर अत्याचार न करनेका उपदेश दिया, किंतु वे उनकी शिक्षा ग्रहण न कर सके। तब क्रोधमें भरे हुए महर्षियोंने तत्काल उन्हें शाप दे दिया, जिससे वे नष्ट हो गये
anu darśa tataḥ śakre pratyagṛhṇān na cāpy asau | tato maharṣiśrīḥ kruddhaḥ sadyaḥ śapto vyanāśyata || dhanyaṃ yaśasyam āyuṣyaṃ kīrtayiṣyāmi te 'nagha |
ဝိုင်ရှမ္ပာယနက မိန့်တော်မူ၏— «အင်ဒြာက မှန်ကန်သောလမ်းကို ပြသသော်လည်း သူသည် မလက်ခံ၊ မလိုက်နာခဲ့။ ထို့ကြောင့် ဂုဏ်ထူးမြတ်သော မဟာရသီတို့သည် ဒေါသထွက်၍ ချက်ချင်း ကျိန်စာချကာ သူကို ဖျက်ဆီးသွားစေ၏။ အို အပြစ်ကင်းသူ၊ ယခု ငါသည် ကောင်းချီးမင်္ဂလာဖြစ်စေ၍ ဂုဏ်သတင်းပေးကာ အသက်ရှည်စေသော မျိုးရိုးကို သင်အား ပြောပြမည်»။
वैशम्पायन उवाच