यह सोपान ‘धर्म-युद्ध’ का नहीं, ‘अहं-युद्ध’ का है—जहाँ भीतर का रावण (मद, मोह, हठ) अपने ही विवेक (विभीषण/मंदोदरी) को ठुकराकर पतन की सीढ़ी उतरता है, और राम-ध्यान स्थिर होकर करुणा सहित निर्णायक कर्म (धनुष चढ़ाना, बाण संधान) करता है। लंका काण्ड साधक को सिखाता है कि विजय बाह्य रण से पहले अंतःकरण की असंकता (निर्भयता) और शरणागति से होती है; यही ‘सोपान’ को ‘मुक्ति-मार्ग’ बनाता है—वैराग्य, विवेक, और भक्ति की पराकाष्ठा।
यह प्रकरण ‘धर्म-युद्ध’ से अधिक ‘अहं-युद्ध’ का रूपक है। रावण का वैभव (महाप्रासाद, गान-नृत्य, वाद्य) बाह्य चमक है जो भीतर के भय और अधर्म-बोध को दबाता है—मद का आवरण। मुकुट-छत्र-ताटंक का गिरना केवल अपशकुन नहीं, ‘अहंकार के शिखर’ का ढहना है: जो सिर पर है वही पहले गिरता है। राम का सुबेल पर ध्यान-आसन और चाप-निषंग धारण करना साधना का आदर्श है—कर्म और ध्यान का द्वैत नहीं, एक ही साधन-रूप। मंदोदरी का ‘रघुबंस-मणि’/विश्वरूप-वर्णन सगुण-निर्गुण समन्वय का संकेत है: राम देह-रूप में भी ब्रह्मांड-व्यापक, फिर भी मानुष-लीला में करुणा सहित मर्यादा निभाते हैं। निष्कर्ष: विजय पहले अंतःकरण की निर्भयता, विवेक और शरणागति से होती है; बाह्य रण उसका फल है।
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