[दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २५ “लोक हैं।] हम () ऑिजआ अप अष्टषष्टितमो< ध्याय: राजा विराटकी उत्तरके विषयमें चिन्ता, विजयी उत्तरका नगरमें प्रवेश, प्रजाओंद्वारा उनका स्वागत, विरादद्वारा युधिछ्िरका तिरस्कार और क्षमा-प्रार्थना एवं उत्तरसे युद्धका समाचार पूछना वैशम्पायन उवाच धनं चापि विजित्याशु विराटो वाहिनीपति: । विवेश नगर हृष्ट भ्वतुर्भि: पाण्डवै: सह,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! सेनाओंके स्वामी राजा विराटने (दक्षिण गोष्ठकी) गौओंको जीतकर शीघ्र ही चारों पाण्डवोंके साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक नगरमें प्रवेश किया इस प्रकार श्रीमह्ा भारत विराटपवकेि अन्तर्गत गोहरणपर्वमें विराट-उत्तर-संवादविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ६८ ॥। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ७९ श्लोक हैं।) #::73:.8 #::3-...7 () हि २ 7 एकोनसप्ततितमो<ध्याय: राजा विराट और उत्तरकी विजयके विषयमें बातचीत उत्तर उवाच न मया निर्जिता गावो न मया निर्जिता: परे । कृतं तत् सकल तेन देवपुत्रेण केनचित्
vaiśampāyana uvāca | dhanaṃ cāpi vijityāśu virāṭo vāhinīpatiḥ | viveśa nagaraṃ hṛṣṭaś caturbhiḥ pāṇḍavaiḥ saha ||
Vaiśampāyana berkata: “Wahai Janamejaya, Raja Virāṭa, panglima bala tentera, setelah segera menawan kembali harta kekayaan itu juga, memasuki kota dengan hati yang amat gembira bersama keempat-empat Pāṇḍava.”
वैशम्पायन उवाच