उद्योगपर्व (अध्याय १२९) — केशवस्य वैभवप्रदर्शनम् / Krishna’s Theophanic Display in the Kuru Assembly
(यथा वाराणसी दग्धा साश्वा सरथकुंजरा । सानुबन्धस्तु कृष्णेन काशीनामृषभो हतः ।। तथा नागपुरं दग्ध्वा शड्खचक्रगदाधर: । स्वयं कालेश्वरो भूत्वा नाशयिष्यति कौरवान् ।। श्रीकृष्णने जिस प्रकार घोड़े, रथ और हाथियोंसहित वाराणसी नगरी जला दी और काशिराजको उनके सगे-सम्बन्धियोंसहित मार डाला, उसी प्रकार ये शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं कालेश्वर होकर हस्तिनापुरको दग्ध करके कौरवोंका नाश कर डालेंगे। पारिजातहरं होनमेक॑ यदुसुखावहम् । नाभ्यवर्तत संरब्धो वृत्रहा वसुभि: सह ।। “यदुकुलको सुख पहुँचानेवाले श्रीकृष्ण जब अकेले पारिजातका अपहरण करने लगे, उस समय अत्यन्त कोपमें भरे हुए इन्द्रने इनके ऊपर वसुओंके साथ आक्रमण किया। परंतु वे भी इन्हें पराजित न कर सके। प्राप्प निर्मोचने पाशान् षट् सहस्रांस्तरस्विन: । हृतास्ते वासुदेवेन हुपसंक्रम्य मौरवान् ।। “निर्मोचन नामक स्थानमें मुर दैत्यने छ: हजार शक्तिशाली पाश लगा रखे थे, जिन्हें इन वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने निकट जाकर काट डाला। द्वारमासाद्य सौभस्य विधूय गदया गिरिम् । द्युमत्सेन: सहामात्य: कृष्णेन विनिपातित: ।। “इन्हीं श्रीकृष्णने सौभके द्वारपर पहुँचकर अपनी गदासे पर्वतको विदीर्ण करते हुए मन्त्रियोंसहित द्युमत्सेनको मार गिराया था। शेषवत्त्वात् कुरूणां तु धमपिक्षी तथाच्युत: । क्षमते पुण्डरीकाक्ष: शक्त: सन् पापकर्मणाम् ।। एते हि यदि गोविन्दमिच्छन्ति सह राजशि: । अद्यैवातिथय: सर्वे भविष्यन्ति यमस्य ते ।। “अभी कौरवोंकी आयु शेष है, इसीलिये सदा धर्मपर ही दृष्टि रखनेवाले कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण इन पापाचारियोंको दण्ड देनेमें समर्थ होकर भी अभी क्षमा करते जा रहे हैं। यदि ये कौरव अपने सहयोगी राजाओंके साथ गोविन्दको बन्दी बनाना चाहते हैं तो सब- के-सब आज ही यमराजके अतिथि हो जायँगे। यथा वायोस्तृणाग्राणि वशं यान्ति बलीयस: । तथा चक्रभृतः सर्वे वशमेष्यन्ति कौरवा: ।। ) 'जैसे तिनकोंके अग्रभाग सदा महाबलवान् वायुके वशमें होते हैं, उसी प्रकार समस्त कौरव चक्रधारी श्रीकृष्णके अधीन हो जायाँगे'। विदुरेणैवमुक्ते तु केशवो वाक्यमब्रवीत्
yathā vārāṇasī dagdhā sāśvā sarathakuñjarā | sānubandhas tu kṛṣṇena kāśīnām ṛṣabho hataḥ || tathā nāgapuraṃ dagdhvā śaṅkhacakragadādharaḥ | svayaṃ kāleśvaro bhūtvā nāśayiṣyati kauravān ||
Vaiśampāyana berkata: “Sebagaimana Kṛṣṇa dahulu membakar kota Vārāṇasī—bersama kuda, kereta perang dan gajahnya—serta membunuh raja Kāśī yang gagah laksana lembu jantan, bersama kaum kerabat dan sekutunya, demikian juga Pemegang sangkakala, cakra dan gada ini akan menjadi sendiri Tuhan Waktu, membakar Hastināpura dan membinasakan para Kaurava.”
वैशम्पायन उवाच
The verse frames Kṛṣṇa as the instrument of dharma and the embodiment of Kāla (Time): when wrongdoing ripens, even powerful dynasties fall. Ethical accountability is presented as inevitable—delayed by patience, but not cancelled.
A warning is voiced through Vaiśaṃpāyana’s narration: recalling Kṛṣṇa’s earlier destruction of Vārāṇasī and the slaying of the Kāśī ruler with his supporters, it predicts a similar fate for the Kauravas—Hastināpura will be consumed and their power ended when Kṛṣṇa assumes the role of Kāla.