भारं स वहते तस्य ग्रन्थस्यार्थ न वेत्ति यः । यस्तु ग्रन्थार्थतत्त्वज्ञो नास्य ग्रन्थागमो वृथा,जो ग्रन्थके अर्थको नहीं समझता, वह केवल रटकर मानो उन ग्रन्थोंका बोझ ढोता है; परंतु जो ग्रन्थके अर्थका तत्त्व समझता है, उसके लिये उस ग्रन्थका अध्ययन व्यर्थ नहीं है
Sesiapa yang tidak mengetahui makna kitab itu, dia hanya memikul beban kitab tersebut. Tetapi sesiapa yang mengetahui tātva makna kitab, baginya pengajian kitab itu tidaklah sia-sia.
वसिष्ठ उवाच