Prahlāda–Indra Saṃvāda: Kartṛtva (Agency) and Svabhāva (Nature) in the Causation of Karma
नफमजान- () असड अत ३. “कृच्छृ” शब्दसे प्राजापत्यकृच्छुका ग्रहण किया जाता है। प्राजापत्यकृच्छुका विधान इस प्रकार है-- त्यहं प्रातरूयहं सायं तयहमद्यादयाचितम् । त्र्यहं परं च नाश्नीयात् प्राजापत्योड्यमुच्यते ।। (मनुस्मृति ११२१२) तीन दिन केवल प्रातःकाल, तीन दिन केवल सायंकाल तथा तीन दिनतक केवल अयाचित अन्नका भोजन करे। फिर तीन दिनतक उपवास रखे। इसे प्राजापत्यकृच्छु कहा जाता है। २. अधमर्षणसूक्त निम्नलिखित है-- ऋतज्च सत्यज्चाभीद्धात्तपसो&ध्यजायत । ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णव:। समुद्रादर्णवादधिसंवत्सरो अजायत । अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी । सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् | दिवं च पृथिवीज्चान्तरिक्षमथो स्व: । पज्चदर्शाधिकद्विशततमो< ध्याय: आसक्ति छोड़कर सनातन ब्रह्नाकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करनेका उपदेश भीष्म उवाच दुरन्तेष्विन्द्रियार्थेषु सक्ता: सीदन्ति जन्तव: । ये त्वसक्ता महात्मानस्ते यान्ति परमां गतिम्,भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! इन्द्रियोंके विषयोंका पार पाना बहुत कठिन है। जो प्राणी उनमें आसक्त होते हैं वे दुःख भोगते रहते हैं; और जो महात्मा उनमें आसक्त नहीं होते वे परम गतिको प्राप्त होते हैं
bhīṣma uvāca | durantēṣv indriyārthēṣu saktāḥ sīdanti jantavaḥ | ye tv asaktā mahātmānas te yānti paramāṃ gatim ||
Bhīṣma berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, objek-objek indera amat sukar untuk dilampaui. Makhluk yang melekat padanya tenggelam dalam penderitaan berulang-ulang; tetapi jiwa-jiwa agung yang tidak melekat mencapai tujuan tertinggi.”
भीष्म उवाच