Sauptika Parva, Adhyaya 8 — Dhṛṣṭadyumna-vadha and the Camp’s Nocturnal Rout
इस प्रकार श्रीमह्याभारत सौप्तिकपर्वमें द्रोणपुत्रद्वारा की हुई भगवान् शिवकी पूजाविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ७ ॥। अपन करा बछ। जज स:ॉ:ः: - वह मन्त्र इस प्रकार है--'आप्यायस्व समेतु ते विश्वत: सोम वृष्ण्यम् । भवा वाजस्य सड़थे ।। ! अष्टमो<ड ध्याय: अश्र॒त्थामाके द्वारा रात्रिमें सोये 33482 पांचाल आदि समस्त वीरोंका संहार तथा फाटकसे भागते हुए योद्धाओंका कृतवर्मा और कृपाचार्य द्वारा वध घतयाट्र उवाच तथा प्रयाते शिबिरं द्रोणपुत्रे महारथे । कच्चित् कृपश्च भोजश्च भयार्तो न व्यवर्तताम्,धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! जब महारथी द्रोणपुत्र इस प्रकार शिविरकी ओर चला, तब कृपाचार्य और कृतवर्मा भयसे पीड़ित हो लौट तो नहीं गये?
dhṛtarāṣṭra uvāca | tathā prayāte śibiraṃ droṇaputre mahārathe | kaccit kṛpaś ca bhojaś ca bhayārtau na vyavartatām ||
Dhṛtarāṣṭra berkata: “Wahai Sañjaya, tatkala pahlawan kereta agung itu—Aśvatthāmā, putera Droṇa—berangkat demikian menuju ke perkhemahan, adakah Kṛpa dan Bhoja (Kṛtavarmā), yang dihimpit ketakutan, benar-benar tidak berpaling pulang?”
घतयाट्र उवाच